। बचपन।।
था कितना प्यारा बचपननहीं किसी से अनबन।
अपना भी था भाव
ना कोई हृदय पे घाव।।
कागज की कश्ती
थी मौज भरी मस्ती।
गुड्डी - गुड्डों का खेल
चलती बिन पैसों के रेल।।
खेलते गिल्ली- डण्डा
मुख मे धूँआ भरा सरकंडा।
दादी की कहानी
मन को लगे सुहानी।।
किस्सा वो सुनाती
मन को मेरे बहलाती।
मम्मी दबाती पाँव
ममता का शीतल छाँव।।
पकड़ते सब मछलियां
हरी - भरी थी गलियाँ।
वरषा की छम-छम बूँदें
हम सब कीचड़ मे कूदे।।
मिट्टी तन पर लगाये
मम्मी की मार खाये।
पकड़ के वो नहलाती
लोरी गा-गाकर सुनाती।।
सब छिन गया चैन
जाग - जाग बीते रैन।
आज नोन तेल लकड़ी
जो सभी को है जकड़ी।।
बचपन एकबार आता
यही सोंच कर पछताता।
अब ना आयेगा वो दिवस
जग में जकड़ा हुआ परबस।।
स्वरचित मौलिक
।। कविरंग।।
सिद्धार्थ नगर (उ0प्र0)

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