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May 21, 2020

एशिया का सबसे बड़ा किताब बाज़ार कोलकाता Asia ka sabse bada pustak mela kolkata

यादें एशिया का सबसे बड़ा किताब बाज़ार कोलकाता की

कहा जाता है कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट एशिया का सबसे बड़ा क़िताबो का बाज़ार हैं, जी हां, कैसे न रहे बगल में भारत के सबसे पूराने विश्वविद्यालय कलकत्ता विश्वविद्यालय, दरभंगा
बिल्डिंग , प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी , संस्कृत विश्वविद्यालय
,सुरेन्द्रनाथ इवनिंग, डे, वूमेन, उमेशचंद्र, जलान गर्ल्स कॉलेज, चितरंजन, बांगोबासी, सेंट पाल, विद्यासागर,सिटी राजाराममोहन , आंनद मोहन, गिरिशचन्द्र, खुदीराम, जगदीश चन्द्र, शिक्षायतन, गोयनका, स्कॉटिश चर्च,महराजा मनिंद्र चंद्रा मानों तो कुछ ही किलोमीटर में महाविद्यालय ही महाविद्यालय है, तब हम अपने संस्मरण पर चलते है, बस से जाते तो घर से सिर्फ दस किलोमीटर दूर रहा ,पर बस से जाने से अच्छा पैदल जाना , क्योंकि हावड़ा तक तो ठीक पर रवीन्द्रनाथ सेतु पार करते ही वह जाम और वह भी एम. जी यानी महात्मा गांधी रोड की क्या बताऊं , इसलिए बीस किलोमीटर दमदम होते हुए ट्रेन से ही जानें का विचार किये, उन लोगों को बारहवीं की किताब लेना रहा । बात पाँच जून दो हजार सत्ररह शुक्रवार विश्व पर्यावरण दिवस दिन की बात है, अपने एकतरफा प्यार के  प्रिय नेहा व शिष्या बारहवीं कक्षा कला विभाग की जूली नहीं अणू के साथ लिलुआ से बाली गये बैण्डेल लोकल मेन लाइन से फिर डानकुनी सियालदह लोकल पकड़े बाली हल्ट से यहां आने के लिए सीढ़ी चढ़ना पड़ता  ,क्या कहूं वैसे हम तो कॉलेज हावड़ा ब्रिज होते हुए बड़ा बाज़ार बी.के,साव मार्केट, कैनिंग स्ट्रीट पिता जी के मामा यानि दादा जी के यहां साईकिल रखकर वहां से कॉलेज पैदल ही जाते हैं, पर कभी भी अगर हम ट्रेन से जाते तो अपनी प्रिय की स्मरण में उसी सीढ़ी से आते जाते, जिस सीढ़ी से वह गुजरी थी ,टिकट संख्या :-31430426 हमारा रहा अंतिम का जो 26 है वह हमारा बी.ए प्रथम वर्ष हिन्दी आनर्स की क्रमांक रहा, और नेहा की टिकट की अन्तिम संख्या 27 व अणु की 28 रहा वह टिकट आज भी कविता शीर्षक "हम लोगों की सैर" के साथ है,पर हम लोगों के फोटो नहीं , कहती भी रहीं छवि खिंचवाने के लिए पर हम न खिंचवाएं, वे दोनों आपस में सेल्फी लेती रही,उस वक्त हमारा पहला कविता की डायरी लिखाता रहा, वह डायरी, डायरी नहीं एक मोटा रजिस्टर रहा, जो पिताजी अपने कार्यकाल से लाये रहे,उसमें हिसाब किताब हुआ रहा ,
फिर भी हम रोशन उसमें कविताएं लिखते रहें,और अभी हमारा यही कोरोना, कल आये अम्फान तूफान को लेकर हम सोलहवीं डायरी लिख रहे है, जिसमें, कविताएं ज्यादा, हिन्दी, अंग्रेजी, भोजपुरी, मैथिली,बंगाली  में व अन्य विधा हिन्दी में आलेख,दोहा, ग़ज़ल, नाटक, व्यंग्य ,कहानी,गीत, शायरी, हाइकु लिखते हुए सफर कर रहे हैं।
चाउमीन, आईसक्रीम खाये व खिलाये फिर सियालदह से ट्रेन से चले शाम के चार बजे के करीब बाली हल्ट आये, जल्दी रहा दौड़ना पड़ा रहा फिर क्या उन दोनों का भी बस्ता भी लेना पड़ा ,पुराने से नया बाली में कर्ड लाइन की चार नम्बर प्लेटफार्म बनी रही पहले सामने पर अब थोड़ा दूर रहा फिर जैसे तैसे ट्रेन पकड़े लिलुआ पहुंचे, एक गज़ब की बात है वैसे मेरा तो टिकट लगता ही नहीं, कॉलेज की नाम ही काफी रहा , फिर भी इन लोगों के साथ जाना रहा टिकट कटवा लिए, फिर क्या मेरे पास ही टिकट रहा हम आगे वह दोनों पीछे-पीछे, टिटी साहब टिकट निरीक्षक उन दोनों को पकड़ लिए , फिर नेहा आवाज लगाई ,क्या वह आवाज रही ,गये टिकट दिखाये , साहब हस्ताक्षर किए, और नाम पूछे बताएं रोशन , शाय़द बेचारा कुछ जानते रहे ,प्रिय की तरफ देखकर हमें कहे कि अपना रोशनी को तो अपने साथ लेते जाओ ,दिल खुश हो गया रहा उन बातों से ।
जब बाली घाट से चली ट्रेन विवेकानंद सेतु गंगा,हुगली नदी पार करते हुए दक्षिणेश्वर जा रही थी तब हम माँ काली व गंगा माई से प्रार्थना करते रहे हे मां कभी हम भी तुम्हारी पूजा करने अपनी प्रिय के साथ आऊं, पर वह दिन अब तक न आया , शायद आएगा भी नहीं , यही है हमारी उसकी संस्मरण ।

 रोशन कुमार झा
सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज , कोलकाता भारत
May 15, 2020

ख़ुशी से जीवन जीना सीख रहा लॉक डाउन khushi se jivan jina sikha rha lockdown


कोरोना अनुभूति संस्मरण"

*ख़ुशी से जीवन जीना सीख रहा लॉक डाउन*


जीवन में चलते-चलते  पहियों का अचानक रुक जाना बहुत ही दुखदायी प्रतीत हो रहा था।चीन के वुहान शहर से निकला यह कोरोना वायरस लोगों के दिलों दिमाग में भय उत्पन्न कर रहा है।ऐसे में परिवार के साथ सभी लॉक डाउन में अपनी जिंदगी के उतार-चढ़ाव को महसूस कर रहे है। पारिवारिक माहौल में अचानक इतना समय बिताना सभी के लिए एक सुखद अनुभूति दे रहा है।बच्चे बहुत खुश नजर आ रहे है। काफी समय बाद माता-पिता का प्रेम अपनत्व एक साथ रहने का संजोग शायद जीवन में पहली बार बना है। लेकिन कोरोना वायरस के चलते सभी लोग अपने घरों में कैद हो चुके है।प्रशासन द्वारा नियमों का पालन कर रहे है। घर में एक सुखद अनुभूति और एक संस्कारी वातावरण निर्मित हो रहा है। प्रशासन द्वारा दिए जलाना, ताली बजाना एक उत्साहवर्धन त्यौहार की तरह प्रतीत हो रहा था। ग्रहणी अपनी पूरी उर्जा और तत्परता से घर में सभी की सेवा में लगी हुई है। बड़े बुजुर्गों की दवा समय पर खाना, नाश्ता बच्चों का रुचि अनुरूप उनके साथ समय व्यतीत करना। एक कोरोना कर्मवीर की तरह अपने कर्म का निर्वाह खुशी -खुशी कर रही है। यह भयंकर महामारी समाचार पत्रों पर द्वारा मिली जानकारियों के अनुसार सभी को अंदर ही अंदर भयभीत कर रही है। लेकिन परिवार का अपनापन खुशी के पल जो शायद बरसों पहले को खो चुके थे। उन पलों में परिवार के साथ समय व्यतीत करते हुए लोग आनंद की अनुभूति महसूस कर रहे है। हमारे देश के डॉक्टर्स, पैरामेडिकल स्टाफ, पुलिस, सफाई कर्मी यह अपनी-अपनी भूमिका का निर्वाह बहुत ही इमानदारी से कर रहे हैं।वर्तमान में कोरोना लॉक डाउन के अंतर्गत सभी परिवार अपने घरों में रहकर संस्कार, स्नेह, अपनत्व पाकर एक  पारिवारिक मजबूत रिश्तो  के एहसासों में बंध चुके है। हम सभी यह जान चुके है।
कि भौतिक संसाधनों की आवश्यकता का हमारे जीवन में कितना महत्व है। हम भौतिक संसाधनों के बिना भी खुशी से जीवन यापन कर सकते है।हमें जीवन में भौतिक संसाधनों के अलावा पारिवारिक अपनत्व और सहयोग की ज्यादा आवश्यकता है। हम जीवन में उससे कहीं अधिक जरूरतों को पाने की दौड़ में भाग रहे थे। लेकिन हम सब ने यह जाना कि इस ठहरे हुए  समय ने अमीर- गरीब सभी को यह एहसास करवा दिया है। कि जिंदगी में कम से कम आवश्यकताओं में भी हम जीवन यापन कर सकते है।कोरोना के लॉक डाउन से हमें यह सीख मिली है। और हम पुनः अपनी संस्कृति की ओर अग्रसर होते हुए नजर आ रहे है।आज यह एहसास प्रत्येक व्यक्ति को हो रहा होगा की जीवन का मूल्य अनमोल है।और बाकी सब भौतिक संसाधन बेमोल है। जीवन सादगी और सहजता का नाम है। हमें अपने देश का सहयोग करते हुए। स्वदेशी वस्तुओं को अपनाकर अपने देश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सभी को मिलकर एक संकल्प लेना चाहिए। कि हम स्वदेशी वस्तुओं को अपनाकर देश को समृद्ध बनाएं। और पारिवारिक सामाजिक तालमेल मिलाते हुए। समरसता ,एकता ,सहयोग की भावना के साथ एक साथ कदम बढ़ाकर इस महामारी को अपने देश से भगाने में प्रशासन की बातों को मानकर पूरा-पूरा सहयोग प्रदान करना है। एकता में शक्ति  निहित होती है। शक्ति ही सामर्थ प्रदान करती है। और हमें बल देती है। लॉकडाउन हमें यह अनुभूति करवा रहा है, और जीवन जीना सिखा रहा है।कि जीवन का मूल्य कितना अनमोल है।यह हमें इस कोरोना महामारी के लॉकडाउन के चलते ज्ञात हुआ।

      वन्दना पुणतांबेकर
             इंदौर