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January 21, 2022

रीतिकाल का समय Ritikaal ka Samay Hindi sahity

हिंदी साहित्य का रीतिकाल / Hindi sahity or Ritikaal

रीतिकाल  का समय  / Ritikaal ka Samay

हिंदी साहित्य में रीतिकाल की शुरुआत सन् 1700 ई. के आस-पास माना जाता है। और रीतिकाल का समय 1700 संवत से 1900 संवत यानी 1643ई० से 1843ई० तक माना जाता है। इस युग के कवि राजाओं के आश्रय में रहते थे।  रीतिकाल के अधिकांश कवि किसी ना किसी राजा के दरबार में रहते थे।  इस युग में तात्कालिक दरबारी संस्कृति और संस्कृत साहित्य से हिंदी साहित्य को बढ़ावा मिला।  संस्कृत साहित्यशास्त्र के प्रति  लगाव  से रीतिकाल  में शास्त्रीय ग्रन्थों  की रचनाएं और  आचार्य कवियों  का जन्म  हुआ।  रीतिकाव्य रचना का आरंभ एक संस्कृतज्ञ आचार्य केशवदास ने किया।  केशवदास की प्रसिद्ध रचनाएँ कविप्रिया, रसिकप्रिया और रामचंद्रिका हैं।

 

रीतिकाल का अर्थ / Ritikaal ka arth

रीतिकाल साहित्य में रीति का अर्थ मार्ग, पद्ति, परिपाटी है। अर्थात रीतिकाल में सभी कवि किसी परिपाटी (मार्ग) का अनुसार करते थे। इस युग के कवि किसी विशेष रीति को ध्यान में रखकर साहित्य की रचना करते थे। 

रीतिकालीन कवि काव्यशात्रीय लक्षणों को ध्यान में रखकर काव्य लिखा करते थे।  इस काल में कई ऐसे कवि हुए हैं जो आचार्य भी थे और  जिन्होंने  विविध काव्यांगों के लक्षण देने  वाले  ग्रंथ भी लिखे।  इस युग में  शृंगार की प्रधानता रही।  यह युग मुक्तक-रचना का युग रहा।  मुख्यतया कवित्त, सवैये और दोहे इस युग  में ज्यादा लिखे गए।  कवि राजाश्रित होते थे इसलिए कविता (काव्य) में जन साधारण की उपेक्षा हुई है।

 

January 21, 2022

रीतिकालीन दरबारी कवि Ritikaalin darbari kavi sahitya

 रीतिकालीन दरबारी कवि / Ritikal ke darbari kavi

 

रीतिकाल के लगभग सभी कवि राजाओं के अधीन रहते थे। रीतिकाल में Ritikaalin sahity में कवियों ने जनता की उपेक्षा किया और राज दरबार में बैठकर राजा की प्रसंशा करके थे।   रीतिकाल  के दरबारी कवियों की लिस्ट निचे देखे जो परीक्षा की दृष्टि महत्वपूर्ण है। 

 

रीतिकाल के दरबारी कवि/ Ritikaal ke kavi

केशवदास (ओरछा),

प्रताप सिंह (चरखारी),

बिहारी (जयपुर, आमेर),

मतिराम (बूँदी),

भूषण (पन्ना),

चिंतामणि (नागपुर),

 देव (पिहानी),

 भिखारीदास (प्रतापगढ़-अवध),

रघुनाथ (काशी),

बेनी (किशनगढ़),

गंग (दिल्ली),

टीकाराम (बड़ौदा),

ग्वाल (पंजाब),

 चन्द्रशेखर बाजपेई (पटियाला),

हरनाम (कपूरथला),

 कुलपति मिश्र (जयपुर),

 नेवाज (पन्ना),

सुरति मिश्र (दिल्ली),

 कवीन्द्र उदयनाथ (अमेठी),

 ऋषिनाथ (काशी),

 रतन कवि (श्रीनगर-गढ़वाल),

 बेनी बन्दीजन (अवध),

 बेनी प्रवीन (लखनऊ),

 ब्रह्मदत्त (काशी),

 ठाकुर बुन्देलखण्डी (जैतपुर),

बोधा (पन्ना),

गुमान मिश्र (पिहानी)आदि 

 

इस प्रकार सभी कवि किसी ना किसी रियासत के अधीन थे। कुछ ऐसे कवि भी हुए है जो स्वयं राजा थे। 

जैसे- महाराज जसवन्त सिंह (तिर्वा),

भगवन्त राय खीची,

भूपति, रसनिधि (दतिया के जमींदार),

महाराज विश्वनाथ,

द्विजदेव (महाराज मानसिंह) आदि।

 इस प्रकार Ritikaalin sahity रीतिकालीन साहित्य की रचना राजाओं के आश्रय में हुआ है । इसीलिए कल्पना प्रधान और मनोरंजन प्रधान साहित्य रीतिकाल में देखने को मिलते है । यह जानकारी आपको कैसे लगी कोमेट करके बताये की कृपा करे। यदि आपका कोई सुझाव है तो वह भी कोमेट में लिखे ।