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साहित्य
sherashah Banda jila कविता- अपना बाँदा
कविता - अपना बाँदा
बहुत उलझन में हूँ। bahut ualjhan me hun
बहुत उलझन में हूँ
कविता -आवाज़े आईना Awaz Aaina कवि मुकेश भटनागर
आवाज़े आईना
एक बार तो सुनो कभी आवाज़े आईना
हमको हमारा हाल सुनाता है आईना
आवाज़े आईना एक राज़े आईना
एक बार तो सुनो कभी आवाज़े आईना
हमको हमारा हाल सुनाता है आईना
बेख़ौफ़ बेफिक्र रहता है आईना
हाज़िरजवाब हरदम नाज़ुक सा आईना
चेहरे पे दाग़ है या तिल कहता है आईना
राजा रंक दोनों से कहता है आईना
बंदे हैं एक ख़ुदा के बताता है आईना
वक़्त वक़्त की है बात बताता है आईना
एक बार भी जो बात आईने से ना कर सका
राहे खुदा पे वो कभी आगे ना बढ़ सका
कहता है हर शख्स से घर घर का आईना
बेज़ुबान आईना सच ही बोलता है
रूबरू जो बैठो एकदम से बोलता है
सोया नहीं है एक पल सदियों से आईना
कवि
मुकेश भटनागर"आवाज़,
वैशालीनगर, भिलाई
93036 55494
मातृभूमि के प्रति/matribhumi ke prati/देश भक्ति कविता
"मातृभूमि के प्रति"
पशु तुल्य हैं वो लोग जो कहें -
"मातृभूमि पे हमारे एहसान हैं"
आदमी हैं वो लोग जो कहें -
"मातृभूमि के हम पर एहसान हैं"
इंसान हैं वो लोग जो कहें -
"मातृभूमि पे मिटने हेतु हमारे अरमान हैं
महान हैं वो सैनिक,
मातृभूमि के प्रति जिनके जीवन बलिदान हैं।
अति महान हैं वो माता पिता,
जिनके बेटों के शहीदों में नाम हैं ।
महानतम हैं वो नारियां,
जिनके आंसू सूख चुके हैं और जिनके सुहाग का शहीदों की सूची में नाम है ।।
कवि
मुकेश भटनागर"आवाज़",वैशालीनगर,भिलाई
93290 07369
पुरूष होना आसान नहीं/kavita Purush kavyitri Anju lakhnavi
पुरुष
बाल विवाह कवि आकिब जावेद/baal vivah/chhoti उम्र me bachcho की shaadi नहीं करना चाहिए
बाल विवाह
राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष (24 जनवरी) / कविता - बेटियाँ
राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष (24 जनवरी)
कच्चे दीये बना कर बैठ गई/कवि आकिब जावेद/Diwali par kavita kachche diye
Deepawali par kavita
दीये
कैसे जले दीप/Kaise jale deep/deepawali pr kavita
कविता - दिल वाली दीवाली/Dil waali Diwali/Anju lakhanawi
दिल वाली दीवाली
छाई चहुँ ओर व्हाट्सएप वाली...
Pita par kavita/कविता -पिता, कवि मनोज कुमार वर्मा /Pitaji /Babuji/
शीर्षक - पिता
प्राण-प्रिय कवि सलिल सरोज /Pran Priye /kislay
प्राण-प्रिय
अधरों पर कुसुमित प्रीत- परिणय
केशों में आलोकित सांध्य मधुमय
चिर- प्रफुल्लित कोमल किसलय
दिव्य-ज्योति जैसी मेरी प्राण-प्रिय 1
दृगों से प्रवाहित होता रहता हाला
वो मेरी मधुकलश वोही मधुशाला
मृग- पदों से कुचालें भरती बाला
प्राण - घटकों की उष्मित दुःशला 2
ब्रह्माण्ड की नव- नूतन कोमल काया
मरूभूमि में आच्छादित शीतल छाया
व्योम की मस्तक पर आह्लादित माया
मनभावन मुस्कान की वो सरमाया 3
विटपों के अंगों पर जैसे कोई चित्रकारी
वायु के बाहुबलों पर द्रुत वेग की सवारी
चहुँ दिशाओं की वो एक-मात्र पैरोकारी
वो ही रम्भा -मेनका, वो ही फूल कुमारी 4
भाव-भंगिमा में देवी का अवतरण
कवि के कविता का नया संस्मरण
किसी किताब का प्रथम उद्धरण
जिस्म से जवान, ख्यालों से बचपन 5
जो भी शांतचित्त हो देख ले, विस्मित हो जाए
इहलोक में विलीन हो जाए , चकित हो जाए
खड़ी बोली से देवों की बोली संस्कृत हो जाए
किसी देवालय के प्रांगण सा झंकृत हो जाए 6
उसके आगमन से जीवन में इष्ट पा लिया
अपने उपेक्षित मन का परिशिष्ट पा लिया
किसी अरुंधति ने अपना वशिष्ठ पा लिया
मूक अक्षरों ने साकार होता पृष्ठ पा लिया 7
तुम्हारे होने से अपने सुकर्मों का ज्ञान हुआ
शील और सौम्य परिणति का प्रमाण हुआ
साधारण जीवात्मा सा जीव, मैं महान हुआ
असफलता से सफलता का सोपान हुआ 8
शीश झुका का प्रतिदिन ईश-वंदन करता हूँ
अवतरित महिमा का अभिनन्दन करता हूँ
इस अनुकम्पा का बारम्बार भंजन करता हूँ
मेरी प्राण-प्रिय, तुम्हारा अनुनन्दन करता हूँ 9
मेरे सजीव होने का अनुपम आधार हो तुम
मैं जिस मंझधार में था,उसकी पतवार हो तुम
मैं तो बस लेश्मात्र हूँ,मेरा सारा संसार हो तुम
पत्राचार का पता:-जी 006, टावर 3
पंचशील पेबल्स सोसाइटी
वैशाली सेक्टर 3
नवीन अस्पताल के समीप
ग़ज़ियाबाद
उत्तर प्रदेश-201014
चाय पर कविता Chay Par Kavita (Tea)
चाय
विधा-कविताचाय की चुस्की में घुला है रफ़्ता-रफ़्ता प्यार,मुस्कुराते लबों पर सदा बढ़ता रहता ख़ुमार।एक कुल्हड़ चाय से उतरे सिरदर्द की मार,हो चाय सा इश्क़ भी हर दिन बन जाए इतवार।रखो अंदाज़ अपना जैसा होता है दिलदार,छूटती नहीं तलब इसकी भले ही हो जाए उधार।सुबह-सुबह जो तुम मेरे लिए गर्मागरम चाय लेकर आती हो,कसम से तुम मेरा हर दिन ख़ास बनाती हो।मैं और तुम यानी हम से चाय भी तो प्यार करती है,तभी तो होंठों से आकर सीधे गले में उतरती है।तेरा साथ न छोड़ेंगे तू मीठे बोल सी घुलकर मिल जाती है,कितने रिश्ते नाते जुड़वाती है जब तू टेबल पर नाश्ते में आती है।रचनाकार-अतुल पाठक " धैर्य "पता-जनपद हाथरस(उत्तर प्रदेश)मौलिक/स्वरचित रचना
टेढ़े मेढ़े रास्तो पर ( kavita Tedhe Medhe Raston par)
टेढ़े मेढ़े रास्तो पर
सोंधी मिट्टी, नदी
तालाब,कुंओ पर
खेत,खलिहान में
लहलहाते पेड़
उसके पत्ते
करते है बाते
आपस में
आते है काम
हम मानव के,
निर्लिप्त है
मनुष्य दोहन में
सुख़ भौतिक भोग में
नही परवाह प्रकृति की
न ही उसे भविष्य की
एकत्र कर रहा कार्बन
छा रहा धुंध कार्बन का
हम ही फैला रहे
कार्बन धरा पर
फैक्ट्री,कारखानों
भौतिकता में लिप्त
हरी-भरी धरा को
काला करने में तुले
नही बचेगी ऑक्सीजन
कार्बन ही कार्बन
का भविष्य और
बचेगी ये धरा
मोल में मिलेंगी
ऑक्सीजन,फिर
सब रह जायेगा
धरा पे धरा का धरा!!
कवि :- आकिब जावेद
रचनाः मौलिक (स्वरचित)
बाँदा,उत्तर प्रदेश




