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January 24, 2022

राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष (24 जनवरी) / बेटियाँ

राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष (24 जनवरी) 


शीर्षक- बेटियाँ


बंद करो अब बोझ समझना, 
मैं हर मोर्चा डटकर लड़ती हूँ, 
बेटा कहना बंद करो,मुझे अब 
मैं बेटी सुन सम्मानित होती हूँ,  

कभी जिस्म पर कभी वस्त्र पर
करते छींटाकशी,प्रयास रोकने का, 
जब भी मौका मैं पाती हूँ
भरती उड़ान फिर अंबर तक, 

गर्भ में अब भी मरती हूँ
ट्रैकों पर पडी़ भी मिलती हूँ, 
अपना सम्मान बचाने को
वस्त्रों की गठरी बन घर से निकलती हूँ, 

मैं दूर-दराज के गांवों में
बिन संसाधन भाग्य से लड़ती हूँ, 
मैं सफल रहूँ या होउं विफल
पर आक्रमण से नहीं ड़रती हूँ, 

मान तुम्हारा बढ़ा रहीं हूँ
पदक देश को दिला रहीं हूँ, 
हारी नहीं हूँ इंतेहानों से
नए मानक मैं रचा रहीं हूँ, 

अंजू 'लखनवी'
असिस्टेंट प्रोफेसर समाजशास्त्र
श्री महेश प्रसाद डिग्री कालेज ,लखनऊ
December 15, 2021

sherashah Banda jila कविता- अपना बाँदा

 कविता - अपना बाँदा

धरती  ऋषि  बाम  देव की,
केन   नदी   का   है  घाट!
यमुना  भी  बहती   यहाँ,
है नवाब  टैंक का ठाट !

दुर्ग अजेय कालिंजर का,
ब्लॉक  है  जिसमे  आठ!

पंच  तहसीलों से जो घिरा,
बुंदेलखंड का है ये भाग!
सात  सौ  इकसठ  गाँव,
खेत - खिलहान और बाग!
शांति- सौहार्द मुहब्ब्त यहाँ ,
कौमी तरानों की बहे राग!

महान साहित्यकारों की तपोभूमि,
पद्माकर,केदारनाथ,नरेंद्र नाम!
विश्व प्रसिद्ध पत्थर यहाँ,
होता शजर का काम !
काली कपास की मिट्टी भी,
आती खेती के बहुत काम!

हिंदी, बुंदेली बोली यहाँ पे,
यहाँ की बात कभी न काट।

बाम्बेश्वर-महेश्वरी मंदिर,
है भूरागढ़ में किला!
जामा मस्जिद विशाल सी
यहाँ सबका दिल मिला!
जहाँ शेर शाह शूरी दफ़न,
है वो ये बाँदा जिला!

-आकिब जावेद
बाँदा,उत्तर प्रदेश
December 04, 2021

बहुत उलझन में हूँ। bahut ualjhan me hun

 बहुत उलझन में हूँ

रस्ते भटक रहे है अब!
कंकड़ियां सवाल कर रही मुझसे,
जवाब किसी गुफ़ा में चले गए है।
नदी में समुद्र कूद रहा है मौन सा,
पौधे पेड़ो से करते है चतुराई,
बहुत उलझन में हूँ!
शोर ने ताला लगा दिया मौन पर,
उलझने दिमाग से करे शिकायत,
वहस ज़िन्दा निगल रही ज़िन्दगी,
क्रूरता ने ख़ूबसूरती पे डाला पहरा।
बहुत उलझन में हूँ,
रस्ते भटक रहे है अब!
ख़ामोशियाँ ले रही अँगड़ाई,
चुप्पी गुम किसी सीवान में,
लहरें उफ़ान मार रही मौज़ो पर,
ज्वार कब से उठ रहा दिल में।
बहुत उलझन में हूँ,
रस्ते भटक रहे है अब!
चाहतो पे ज़रूरत भारी,
ख़्वाब में हक़ीक़त हावी,
सुख-चैन छिन रहा सब,
जबसे जिम्मेवारी आयी।
बहुत उलझन में हूँ,
रस्ते भटक रहे है अब!

-आकिब जावेद
बाँदा,उत्तर प्रदेश
9506824464
December 02, 2021

कविता -आवाज़े आईना Awaz Aaina कवि मुकेश भटनागर

 आवाज़े आईना        


एक बार तो सुनो कभी आवाज़े आईना

हमको हमारा हाल सुनाता है आईना

आवाज़े आईना एक राज़े आईना

एक बार तो सुनो कभी आवाज़े आईना

हमको हमारा हाल सुनाता है आईना


बेख़ौफ़ बेफिक्र रहता है आईना

हाज़िरजवाब हरदम नाज़ुक सा आईना

चेहरे पे दाग़ है या तिल कहता है आईना


राजा रंक दोनों से कहता है आईना

बंदे हैं एक ख़ुदा के बताता है आईना

वक़्त वक़्त की है बात बताता है आईना


एक बार भी जो बात आईने से ना कर सका

राहे खुदा पे वो कभी आगे ना बढ़ सका

कहता है हर शख्स से घर घर का आईना


बेज़ुबान आईना सच ही बोलता है

रूबरू जो बैठो एकदम से बोलता है

सोया नहीं है एक पल सदियों से आईना


कवि

मुकेश भटनागर"आवाज़,

 वैशालीनगर, भिलाई

93036 55494

December 02, 2021

मातृभूमि के प्रति/matribhumi ke prati/देश भक्ति कविता

 "मातृभूमि के प्रति"


पशु तुल्य हैं वो लोग जो कहें -

           "मातृभूमि पे हमारे एहसान हैं"


आदमी हैं वो लोग जो कहें -

            "मातृभूमि के हम पर एहसान हैं"


इंसान हैं वो लोग जो कहें -

      "मातृभूमि पे मिटने हेतु हमारे अरमान हैं


महान हैं वो सैनिक,

    मातृभूमि के प्रति जिनके जीवन बलिदान हैं।


अति महान हैं वो माता पिता,

      जिनके बेटों के शहीदों में नाम हैं ।


महानतम हैं वो नारियां,

        जिनके आंसू सूख चुके हैं और जिनके सुहाग का शहीदों की सूची में नाम है ।।


कवि

मुकेश भटनागर"आवाज़",वैशालीनगर,भिलाई

93290 07369

November 25, 2021

पुरूष होना आसान नहीं/kavita Purush kavyitri Anju lakhnavi

 पुरुष

Purush

पुरुष होना 
आसान कहाँ था... 
खामोशी से सबकी 
ख्वाहिश का जिम्मां लेना
आसान कहाँ था... 
पंक्ति में आगे होने पर भी
लेडीज फर्स्ट कहना
आसान कहाँ था... 
माँ,पत्नी हैं ईस्ट- वेस्ट सी
सामंजस्य बिठाना
आसान कहाँ था... 
खुद के नखरे भूल
सुबह की ट्रेन पकड़ना
आसान कहाँ था.... 
क्रिकेट,पेंटिंग,गजलें भुला 
दवा के पर्चे रखना याद
आसान कहाँ था.... 
जिम्मेदारी को 
फर्ज समझना 
आसान कहाँ था... 
पुरुष होना आसान कहाँ था
छिपा के आंसू मुस्कान लगाना
आसान कहाँ था... 

अंजू 'लखनवी'
अस्टिटेंट प्रोफेसर
एवं कवयित्री
November 25, 2021

बाल विवाह कवि आकिब जावेद/baal vivah/chhoti उम्र me bachcho की shaadi नहीं करना चाहिए

बाल विवाह

बाल विवाह

 बचपन  मे  दिन  बीते खेल- कूद करते हुए,
बारिश  में भींग जाते उछल कूद करते हुए।
खेल हमारे अलग - अलग से हुआ करते थे,
काम से होते ही फुरसत हम खेला करते थे।

लड़के-लड़कियों का खेल अलग अलग बंटे थे,
लड़कियों के साथ गुड्डा-गुड्डी,खो-खो खेलते थे।
लड़को के साथ छुपन - छुपाई ,गेंद - गिप्पा थे,
छेड़कानी होती थोड़ा हम ना समझ डिब्बा थे।

थोड़ी बड़ी होकर जब पहुँची उच्च पाठशाला,
ऐसा कुछ  घटित हुआ मेरा मन हुआ काला।
पहली बार हुआ शरीर जब खून से लथपथ,
सहेली ने दूर किया मेरे मन का भी खटपट।

उच्च  पाठशाला पास करते मेरी हो गयी शादी,
पति न अच्छा मिल पाया कैसी किस्मत ला दी।
खेल - खेल  की  उम्र  में मैँ भी बन गयी थी माँ,
खेल - खेल में  ज़िन्दगी की  निकल रही है जाँ।

-आकिब जावेद
स्वरचित एवं मौलिक
बाँदा,उत्तर प्रदेश
November 24, 2021

राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष (24 जनवरी) / कविता - बेटियाँ

राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष (24 जनवरी) 


शीर्षक- बेटियाँ

बंद करो अब बोझ समझना, 
मैं हर मोर्चा डटकर लड़ती हूँ, 
बेटा कहना बंद करो,मुझे अब 
मैं बेटी सुन सम्मानित होती हूँ,  

कभी जिस्म पर कभी वस्त्र पर
करते छींटाकशी,प्रयास रोकने का, 
जब भी मौका मैं पाती हूँ
भरती उड़ान फिर अंबर तक, 

गर्भ में अब भी मरती हूँ
ट्रैकों पर पडी़ भी मिलती हूँ, 
अपना सम्मान बचाने को
वस्त्रों की गठरी बन घर से निकलती हूँ, 

मैं दूर-दराज के गांवों में
बिन संसाधन भाग्य से लड़ती हूँ, 
मैं सफल रहूँ या होउं विफल
पर आक्रमण से नहीं ड़रती हूँ, 

मान तुम्हारा बढ़ा रहीं हूँ
पदक देश को दिला रहीं हूँ, 
हारी नहीं हूँ इंतेहानों से
नए मानक मैं रचा रहीं हूँ, 

अंजू 'लखनवी'
असिस्टेंट प्रोफेसर समाजशास्त्र
श्री महेश प्रसाद डिग्री कालेज ,लखनऊ
November 03, 2021

कच्चे दीये बना कर बैठ गई/कवि आकिब जावेद/Diwali par kavita kachche diye

 Deepawali par kavita 

 दीये 

कच्चे दीये बना कर बैठ गई
वो उम्मीद सज़ा कर बैठ गई!
मेरी दीवाली भी रोशन होगी
वो भी आस लगाकर बैठ गई!

कोई न आया दिये लेने पास
वो बहुत  हतास और निराश
कैसे  खुशियाँ  आयेगी पास
वो निराश - उजागर बैठ गई!

रंग  बिरंगी  सी है दुनियाँ
यहाँ  किसी  की फ़िक्र कहाँ
अपना- अपना देखते सब
किसका दामन भरा यहां।

मासूम उमर सुख पायेगी
मेरी माँ दीये बेच के आएगी!
हमें भी नए बसन दिलाएगी
हमे खूब पकवान खिलाएगी!

साब ले लो कच्चे दिए माँ के
कई सपनो को बेच रही है ये!
दीप घर में लाओ मेरी माँ के
धूप में परिश्रम कर रही है ये!

आकिब जावेद (Aakib_Javed)
स्वरचित/मौलिक
November 03, 2021

कैसे जले दीप/Kaise jale deep/deepawali pr kavita

 कैसे जले दीप 

ईश्क में दिलजले
दीपावली में दीप
संग समाज तब जले
उन्नति की, जब हो भीत।।

इस दीपावली कैसे जले
हर घर में दीप
दो सौ के पार है
कड़ूआ कडवा नीर।।

फल सब्जी कोसो भागे
पाकेट जाये झूल
कैसे कैसे सपने दिखाके
घर घर पहुंचाये शूल।।


     आशुतोष
पटना (बिहार)
November 02, 2021

कविता - दिल वाली दीवाली/Dil waali Diwali/Anju lakhanawi

दिल वाली दीवाली 

Diwali

 कहाँ है दिल वाली दीवाली 
छाई चहुँ ओर व्हाट्सएप वाली... 

चूरा-गट्टा अब छुए न बच्चे
खुशियाँ चाकलेट के डिब्बे वाली... 

मिट्टी के घरौंदे,चक्की-चूल्हा हुए नदारद
कृत्रिम खिलौने से सजने वाली.... 

मिलना-जुलना,आशीर्वाद ,बधाई
अब सिमटा सेम टू यू तक भाई...

दिखती सम्पन्नता गायब उल्लास
बाजारों की चकाचौंध वाली... 

तेल के दिए आउटडेटेड मैसी
रंगीन बैटरी चालित झालर वाली...

समय नहीं अपनों संग दो पल 
यादें बनाते बस सेल्फी वाली...

घर के पकवान आयली लगते
डिब्बा बंद रसगुल्लों वाली... 

कहाँ है दिल वाली दीवाली
छाई चहुँ ओर व्हाट्सएप वाली...

अंजू लखनवी
October 30, 2021

Pita par kavita/कविता -पिता, कवि मनोज कुमार वर्मा /Pitaji /Babuji/

 शीर्षक - पिता

 
हर दर्द की दवा होते हैं, पिता
  कभी डाटते हैं, तो कभी फटकारते हैं पिता।

जब देखते है मायूस चेहरा तो गले से लगा लेते है, पिता
जब आते हैं, हमारी आंखों में आसूं तो अपनी आंखो में समां लेते है पिता।

अपना निवाला भी हमें खिलाते हैं, पिता 
  अपनी ख़ुशी भी हम पर लुटा देते है पिता।

जब कभी - भी चोट लगती है,
 तो  याद आते है, पिता
मुसीबतों से छुपाने के लिए अपने दिल में छुपा लेते है पिता।

प्यार भरे हाथों से निवाला देकर दुःख - दर्द भुला देते हैं पिता,

समय होता है जब खाने का, तो सामने आ जाते है पिता।
   पहले हमें और बाद में खुद खाते हैं पिता,

घर का पूरा भार संभालते हैं पिता,
रिश्तों में प्यार निहारते हैं पिता।
परिवार में संस्कार को जोड़कर रखते है पिता,

शब्दों में बयां नहीं होते पिता के उपकार।
सभी को मिलते है, उन्हीं से संस्कार,
     धन्य है पिता, भगवान् का रूप है पिता।


संक्षिप्त परिचय- मनोज कुमार वर्मा। 
गांव- बासनी, 
तहसील -लक्ष्मणगढ़
जिला - सीकर 
राजस्थान
पिन कोड - 332311
मो.9664487170

October 29, 2021

प्राण-प्रिय कवि सलिल सरोज /Pran Priye /kislay

      प्राण-प्रिय


अधरों पर कुसुमित प्रीत- परिणय
केशों में आलोकित सांध्य मधुमय
चिर- प्रफुल्लित  कोमल किसलय
दिव्य-ज्योति जैसी मेरी प्राण-प्रिय  1

दृगों से प्रवाहित होता रहता हाला
वो मेरी मधुकलश वोही मधुशाला
मृग- पदों से कुचालें भरती  बाला
प्राण - घटकों की उष्मित दुःशला  2

ब्रह्माण्ड की नव- नूतन कोमल  काया
मरूभूमि में आच्छादित शीतल  छाया
व्योम की मस्तक पर आह्लादित माया
मनभावन  मुस्कान  की  वो  सरमाया 3

विटपों के अंगों पर जैसे  कोई चित्रकारी
वायु के बाहुबलों पर द्रुत वेग की सवारी
चहुँ दिशाओं की वो एक-मात्र पैरोकारी
वो ही रम्भा -मेनका, वो ही फूल कुमारी  4

भाव-भंगिमा में देवी का अवतरण
कवि के कविता का नया संस्मरण
किसी किताब  का प्रथम  उद्धरण
जिस्म से जवान, ख्यालों से बचपन  5

जो भी शांतचित्त हो देख ले, विस्मित हो जाए
इहलोक में विलीन हो जाए ,  चकित हो जाए
खड़ी बोली से देवों की बोली संस्कृत हो जाए
किसी देवालय के प्रांगण  सा झंकृत  हो जाए  6

उसके आगमन से जीवन में इष्ट पा लिया
अपने उपेक्षित मन का परिशिष्ट पा लिया
किसी अरुंधति ने अपना वशिष्ठ पा लिया
मूक अक्षरों ने साकार होता पृष्ठ पा लिया  7

तुम्हारे होने से अपने सुकर्मों का ज्ञान हुआ
शील  और सौम्य परिणति का प्रमाण हुआ
साधारण जीवात्मा सा जीव,  मैं महान हुआ
असफलता से  सफलता  का  सोपान हुआ  8

शीश झुका का प्रतिदिन ईश-वंदन करता हूँ
अवतरित महिमा  का  अभिनन्दन  करता हूँ
इस अनुकम्पा का बारम्बार भंजन करता  हूँ
मेरी प्राण-प्रिय, तुम्हारा अनुनन्दन करता  हूँ  9

मेरे सजीव  होने का  अनुपम  आधार हो तुम
मैं जिस मंझधार में था,उसकी पतवार हो तुम
मैं तो बस लेश्मात्र हूँ,मेरा सारा संसार हो तुम
हे प्राण-प्रिय,मेरी जीवटता का आह्वान हो तुम  10


सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी
लोक सभा सचिवालय
संसद भवन
नई दिल्ली
Email: salilmumtaz@gmail.com
9968638267

पत्राचार का पता:-जी 006, टावर 3

पंचशील पेबल्स सोसाइटी 

वैशाली सेक्टर 3

नवीन अस्पताल के समीप

ग़ज़ियाबाद 

उत्तर प्रदेश-201014

October 14, 2021

चाय पर कविता Chay Par Kavita (Tea)

 चाय

विधा-कविता

चाय की चुस्की में घुला है रफ़्ता-रफ़्ता प्यार,
मुस्कुराते लबों पर सदा बढ़ता रहता ख़ुमार।

एक कुल्हड़ चाय से उतरे सिरदर्द की मार,
हो चाय सा इश्क़ भी हर दिन बन जाए इतवार।

रखो अंदाज़ अपना जैसा होता है दिलदार,
छूटती नहीं तलब इसकी भले ही हो जाए उधार।

सुबह-सुबह जो तुम मेरे लिए गर्मागरम चाय लेकर आती हो,
कसम से तुम मेरा हर दिन ख़ास बनाती हो।

मैं और तुम यानी हम से चाय भी तो प्यार करती है,
तभी तो होंठों से आकर सीधे गले में उतरती है।

तेरा साथ न छोड़ेंगे तू मीठे बोल सी घुलकर मिल जाती है,
कितने रिश्ते नाते जुड़वाती है जब तू टेबल पर नाश्ते में आती है।

रचनाकार-अतुल पाठक " धैर्य "
पता-जनपद हाथरस(उत्तर प्रदेश)
मौलिक/स्वरचित रचना
October 13, 2021

टेढ़े मेढ़े रास्तो पर ( kavita Tedhe Medhe Raston par)

 टेढ़े मेढ़े रास्तो पर

सोंधी मिट्टी, नदी
तालाब,कुंओ पर
खेत,खलिहान में
लहलहाते पेड़
उसके पत्ते
करते है बाते
आपस में
आते है काम
हम मानव के,
निर्लिप्त है
मनुष्य दोहन में
सुख़ भौतिक भोग में
नही परवाह प्रकृति की
न ही उसे भविष्य की
एकत्र कर रहा कार्बन
छा रहा धुंध कार्बन का
हम ही फैला रहे
कार्बन धरा पर
फैक्ट्री,कारखानों
भौतिकता में लिप्त
हरी-भरी धरा को
काला करने में तुले
नही बचेगी ऑक्सीजन
कार्बन ही कार्बन
का भविष्य और
बचेगी ये धरा
मोल में मिलेंगी
ऑक्सीजन,फिर
सब रह जायेगा
धरा पे धरा का धरा!!

कवि :- आकिब जावेद
रचनाः मौलिक (स्वरचित)
बाँदा,उत्तर प्रदेश

June 15, 2021

लडकियों को तहजीब सीखाएं- मायके पक्ष Ladkiyo ko tahjeeb sikhaye (lekhak_ashutosh)

 लडकियों को तहजीब सीखाएं- मायके पक्ष 

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हमारे सनातन धर्म में कहा गया है लड़की का सुहागन होना और ससुराल में होना शुभ है ,और संस्कारिक मर्यादा भी।लेकिन आज कल के माॅम डैड ने इसे वर्बाद कर रखा है।सबसे ज्यादा विकट स्थिति का माध्यम फोन का घंटो तक आदान प्रदान होना।जिस किसी घर में ऐसी बीमारी लगी है वह घर रिश्ते की लिहाज से दम तोड़ चुके हैं । जबसे यह आधुनिक फोन का प्रचलन बढा है मायके का हस्तक्षेप बढता गया है। जिसे कोई खुद्दार पति शायद बर्दाश्त नहीं करता और यही सम्बन्धों की एक दीवार खड़ी करती है जो आये दिन अदालतें थाने और विभिन्न आयोग के बढ़ती फाइलों में दम तोड़ रही है।

प्राचीन काल में ऐसा बिल्कुल नहीं था रिश्तों की एक बुनियाद होती थी ।मायके पक्ष कभी भी नादानी या ओछी बात नही करते थे बल्कि अपने बच्ची को समझाते थे ।जिससे रिश्ता प्रगाढ और निरंतर बना रहता था।जब कोई खास आयोजन में उनसे राय मांगी जाती थी तो वे मशवरा देते थे आज बिल्कुल अलग है ।आज दाल में नमक अधिक हो गया अगर पति ने डांट दी तो पति को डाटने के लिए प्रोग्राम बनाया जाता है जिसका माध्यम भी मोबाइल ही है जबकि पहले लोग हंसकर उड़ा डालते थे। यही फर्क है आज के इस नयी पीढी में जिसकी वजह से नौबत तालाक तक पहुंच जाती है।घरेलू हिंसा और प्रताड़ना की सारे हदें पार कर चुका यह समाज अब पतन की कगार पर खड़ा है जिसकी वजह है एकल मानसिकता से ग्रसित लडकियां शादी के बाद सिर्फ एकल परिवार को बढावा दे रही है।

ऐसा नही कि एकल होने के बाद यह सिलसिला समाप्त हो जाता है अपितु बढ़ जाता है।कई पुरूष चुपचाप सहकर जीवन निर्वाह कर लेते है तो कई डिप्रेशन के शिकार हो जाते है।क्योंकि कलह की निरंतरता बनी रहती है।आज अदालतों में सबसे ज्यादा मुकदमे तालाक के है,महिला थाना में परिवारवाद की केस की संख्या इतनी ज्यादा है कि नम्बर आने में महीनो लग जाते है।महिला आयोग मानवाधिकार आयोग में भी प्रायः यही स्थिति है।

अब सवाल उठता है ऐसा क्यों है ऐसा इसलिए है क्योंकि ""एको अहम द्वितीयो नाश्ती। की मानसिकता जब पनपने लगती है तो सामने वाला बडा हो बुजुर्ग हो अथवा गेस्ट हो आप तरजीह नही देते और अपनी बात को सबसे उपर रखते है ।आप समझने की कोशिश नही करते कि आपकी बच्ची सही है या दामाद आप सिर्फ और सिर्फ अपनी एको हम द्वितीयो नाश्ती की परिभाषा को परिभाषित करते है जिससे सम्बन्ध विच्छेद होता है।

 युग कितना भी बदल जाय पर संस्कार तो घर और परिवार ही देता है और जब एकल परिवार ही रहेगा तो संस्कार कहां से आएगा ।यह आज की वास्तविकता है जिसे स्वीकार करना होगा।रिश्ते करने से पहले यह एक आवश्यक पहलू है जिसे हरकोई देखता है। मायके का बढ़ता प्रचलन विगत दशको से खूब फल फूल रहा जरूरत से ज्यादा उनकी भागीदारी ससुराल पक्ष में भी कटुता पैदा करता है ।यह भी घरेलू हिंसा का एक कारण है।कारण अनेको हैं जिसे समझने की जरूरत है।

देखा जाय तो संयुक्त परिवार का विधटन ऐसे तमाम परेशानियों को जन्म दे गया जो आज समाज में अभिशाप बना हुआ है। हमारे हिन्दु समाज में तालाक महिला थाना या महिला आयोग नही हुआ करती थी । इन सभी चीजो को बढ़ती घटनाओ को देखकर समयानुसार बनाया गया है।अलग कानून बनाकर महिला को सशक्त किया गया है ।लेकिन ऐसी सशक्तिकरण का क्या जहां पुरूष प्रताडित होते रहे।

आज महिला प्रताड़ना से ज्यादा पुरूष प्रताडित किए जाते है ।पुरूष की हालत ऐसी है कि वह चाहकर भी अपनी बात किसी से नही करता जबकि हकीकत तो सभी जानते हैं ।आखिर सरकार द्वारा बनाये गये कानून का कोई सदुपयोग करे यह सुनिश्चित भी तो नही क्योंकि शातिर दिमाग दुरूपयोग की ज्यादा सोच रखता है। आज ऐसे करोडो पुरूष है जो किसी न किसी रूप से अपनी पत्नी अथवा किसी महिला द्वारा प्रताडित है। क्या सरकार पुरूष आयोग बनाएगी ? वैसे कईयों को महिला कानून के गलत इस्तेमाल पर दंड भी दिया गया है लेकिन इसकी तादाद कम है।इसलिए मां बाप लड़कियों को मन विषैला करने के वजाय ससुराल में रहने का तरीका सीखाना चाहिए।तभी इन अदालतों का बोझ कम हो सकेगा।


                                             आशुतोष 
                                           पटना बिहार 
June 15, 2021

बादल की बौछार (कवि महेश कुमार हरियाणवी) badal ki bauchhar

बादल की बौछार


दो बूँद गिरा गया बादल
महका है धरती का आँचल।
बन सर्द पवन लहराई
मिट्टी की महक-महकाई।

                    सब काम काज रुक गए हैं
                    बादल के आगे झुक गए हैं।
                    ममता ने ली है अंगड़ाई
                    लो सब ने प्यास बुझाई।

खामोश हुआ इंसान जब
पड़ी गर्ज की चमक दिखाई।

                      पानी-की बौछार चलाके
                      संगीत में सूर को मिलाके।
                      गालों को मर्म सहलाएँ
                      कानों से थरथरी आएँ।

सप्तधनू आकाश में छाया
देने सूक्ष्म श्रेस्ट बधाई।

                        दो बूँद गिरा गया बादल
                        महका है धरती का आँचल।
                        बन सर्द पवन लहराई
                        मिट्टी की महक-महकाई।

                                महेश कुमार हरियाणवी
                                        महेंद्रगढ़
                                9015916317
                               Twitter: @mk_poems
June 14, 2021

महरूम Mahroom अतुल पाठक धैर्य

 महरूम

--------------
जाने कहाँ गए वो दिन,
न जाने कहाँ किस जहाँ में गुम हो गए।
फ़ासले दिलों के जो बढ़ते गए ,
मोहब्बत से हम महरूम हो गए।

मोहब्बत महरूम है पर तेरा ख़्याल नहीं,
ज़िंदगी की सच्चाई है 
हर तमन्ना गर पूरी हो जाए  
फिर तो तमन्ना तमन्ना ही नहीं 
यही सोचकर अब कोई मलाल नहीं। 

न मायूस मैं न मोहब्बत मआल है,
हूँ मैं बस अपनी शायरियों में मशरूफ
यही अपना हाल है।



रचनाकार-अतुल पाठक "धैर्य"
पता-जनपद हाथरस(उत्तर प्रदेश)
मौलिक/स्वरचित

June 04, 2021

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष vishav paryavaran diwas

 विश्व पर्यावरण दिवस विशेष

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आओ पर्यावरण दिवस मनाएं,
पहले इसे बचाने की कसम खाएं।

पेड़ कभी न काटे जाएं,
गर स्वार्थी मानव इंसान कभी बन पाएं।

परिवेश में पेड़-पौधे पशु-पक्षी और जन-मानस सब एक हैं,
फिर क्यों नहीं करते प्रेम सभी को और क्यों नहीं बनते नेक हैं।

हम लोग अपनी और अपने परिवार की देखभाल तो कर लेते हैं,
पर कभी हमारे परिवेश की सोच न पाते हैं।

आज बाग देखने को नहीं मिलते,
हरियाली सुख से वंचित रह जाते हैं।

आख़िर हम पेड़ क्यों नहीं लगाते हैं,
जबकि पेड़ ही हमें फल फूल सब्जी यहां तक कि हमें प्राणवायु ऑक्सीजन छाँव भरा सुकून इतना सब कुछ तो देते हैं।

पशु पक्षियों को मार काट कर क्रूर मानव घोर कलियुग परिभाषित करते हैं,
अब हाय कोरोना हाय कोरोना तौबा तौबा क्यों करते हैं।

सज्जन बनकर इंसान बनो,
प्रकृति से निश्चल प्यार करो।

क्या कुछ नहीं देती प्रकृति हमको,
पर कभी हमसे है क्या लेती 
सदा ही देती सदा ही देती।


रचनाकार-अतुल पाठक " धैर्य "
पता-जनपद हाथरस(उत्तर प्रदेश)
मौलिक/स्वरचित रचना
June 04, 2021

घर से बाहर मत निकल-कोरोना जाएगा निगल Ghar se bahar mat niklo

 घर से बाहर मत निकल-कोरोना जाएगा निगल


कोरोना रूपी शत्रु ये अदृश्य है, महा विनाश इसका लक्ष्य है।
कर न बिल्कुल भूल, तू जरा भी ना फिसल।
घर से बाहर मत निकल - कोरोना जाएगा निगल।
बुरी तरह से झकझोर रखा है विश्व को, रुला रखा है जगत को।
फूंक - फूंक कर बढ़ा कदम, जरा अभी तो संभल।
घर से बाहर मत निकल - कोरोना जाएगा निगल।
अगर उठा जो एक गलत कदम, कितनों का घुट जाएगा दम।
तेरी जरा सी भूल से, संपूर्ण देश जाएगा दहल।
घर से बाहर मत निकल - कोरोना जाएगा निगल।
संतुलित आहार कर और संतुलित व्यवहार कर।
बस कुछ ही दिनों की बात है, घर में बैठ इतना भी तू ना मचल।
घर से बाहर मत निकल - कोरोना जाएगा निगल।
एकांत में ही रह, स्वयं को अकेला महसूस न कर।
दो गज दूरी, मास्क पहनना है जरूरी।
घर से बाहर मत निकल - कोरोना जाएगा निगल।



रचनाकार :- शैताना राम बिश्नोई,
प्रधानाध्यापक, जोधपुर