कलम लाइव पत्रिका

ईमेल:- kalamlivepatrika@gmail.com

Sponsor

Showing posts with label आलेख. Show all posts
Showing posts with label आलेख. Show all posts
January 16, 2022

भाई साहब बोले Bhai sahab लेखक आशुतोष

 भाई साहब बोले 


रामबदन रोज की तरह अपने खेतों में काम कर रहा था काम करते हुए उसे चाय पीने की तलब लगी।जो प्रायः रोज का रूटीन ही था ।वह काम छोड़ बगल वैद्य जी की दुकान की ओर चल पडा। वैद्य जी की दुकान कम राजनीति अखाड़ा और अखाडे पर विश्लेषण और उपाय पर चर्चाएं आम बात थी, जबकि वैद्य जी भले ही चाय की दुकान चलाते थे,  पर वो राजनीतिक समझ के साथ साहित्यिक रचनाएं लिखते थे जो प्रायः अखबारो में छपती थी।

वैद्य जी देखते ही बोले कैसे हो रामबदन?
ठीक हूँ !  वैद्य जी दुकान पर भीड़ थी, और सभी लोग  नोटबंदी पर दलील दे रहे थे।

एक भाई साहब ने कहा-  ये नोटबंदी तो ठीक ही था, होना भी चाहिए, तो दूसरे ने कहा होना तो ठीक है भैया! पर ऐसे नहीं, सरकार को नोट ही ऐसी बनानी चाहिए जो एक समय सीमा पर खुद खत्म हो जाय सारे झंझट से छुटकारा ।।
 वो कैसे?  भैया तनिक सुझाव तो दो ।। इतना बडा जो ये जैन कांड हुआ है रूपया इतना-इतना कैश मिला है सब न खराब खुद हो जाता ।। ये पैसा तो बाजार का है, पब्लिक का है, सरकार का है लेकिन देश में इससे भी कहीं ज्यादा धनकुबेर बैठे हैं, सोचो कितना पैसा देश के अंदर दीवारो में कैद हैं जबकि इन्हें बाजार का रौनक होना चाहिए था।अगर नोट में खुद समाप्त होने की शक्ति हो जाये तो काला धन कोई रखेगा ही नहीं।।।

रामबदन एकटक उनकी बातो को सुनकर बोला हां ये ठीक रहेगा लेकिन ये तो चाय की दुकान है यहां तो नोट नहीं छपेंगे । काश यही सोच सरकारों को भी आये और इन काले कुवेरों के धन पर लगाम लग सके।

 एक तय समय सीमा के अंदर नोटो का चलन में न होना एक जटिल समस्या का सरल उपाय हो सकता है।।
                                             आशुतोष 
                                           पटना बिहार 
December 11, 2021

हिन्दी ग़ज़ल में दलित दस्तक/Hindi gazal me dakait dastak @-dalit sahitya

 हिन्दी ग़ज़ल में दलित दस्तक (Hindi ghazal me dalit Dastak

  

Dalit दलित

हिंदी में दलित साहित्य की अवधारणा भक्ति काल में रैदास की कविताओं से शुरू हुई,  लेकिन उसे वास्तविक पहचान आधुनिक काल में दलित लेखकों की आत्मकथा से   मिली. हिंदी की पहली दलित कथा मोहनदास नैमिशराय की  अपने-अपने पिंजरे(1995) मानी जाती है. उसके बाद ओमप्रकाश वाल्मीकि का जूठन(1997) प्रकाशित होता है. यह दोनों दलित साहित्य के बेहद महत्वपूर्ण आत्मकथा रहे. इसमें दलितों का पूरा जीवन दिखाया गया है कि वह किस तरह की जिंदगी जीने को विवश हैं. इसी क्रम में कौशल्या बैसंती का दोहरा अभिशाप (1999) सूरजपाल चौहान का तिरस्कृत(2002) धर्मवीर का मेरी पत्नी और भेड़िया(2009) तथा तुलसीराम का मुर्दहिया(2010) आदि का नाम भी लिया जा सकता है. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी दलितों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए जो लंबा संघर्ष करना पड़ा जूठन इसे गंभीरता से उठाती है. मुर्दहिया पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल में शिक्षा के लिए के लिए संघर्ष एक दलित की मार्मिक अभिव्यक्तिि है. दोहरा अभिशाप इस बात को मजबूती से रखती है कि स्त्री अगर दलित भी हो तो उसे दोहरे अभिशाप से गुजारना पड़ता है. एक उसका स्त्री होना और दूसरा उसका दलित होना.


                            आधुनिक हिंदी कविता में दलित दस्तक हीरा डोम की काव्य रचना अछूत की शिकायत से मिलती है. जिसमें कवि भगवान द्वारा भी भेदभाव किए जाने का वर्णन करता है-'हमनी के दुख भगवनाओं न देखे ' कवि  प्रश्न करता है एक ही जिस्म हमारा भी है और ब्राह्मण का भी. फिर हम दलितों को  वो अधिकार क्यों  नहीं है. सितंबर 1914 की सरस्वती पत्रिका में छपी यह पहली और आखिरी दलित कविता है जिसे भोजपुरी भाषा में लिखा गया था.


                              दलित हिंदू समाज व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर है. उसके पास संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार भी नहीं है. दलित रचनाओं में जहां सामाजिक भेदभाव जनित पीड़ा है, वही दलित कविताओं में शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति के स्वर भी हैं. अन्य कविताओं की तरह दलित कविता मनोरंजन का साधन नहीं है,  बल्कि इसमें अपनी पीड़ा और अपना आक्रोश है. दलित कवि डॉ.एन  सिंह ने जिसे' बे जुबान आदमी की आवाज कहा है'. ओमप्रकाश वाल्मीकि,  कमल भारती, डॉक्टर युवराज सिंह बेचैन मलखान सिंह,  निर्मला पुतुल, जयप्रकाश कर्दम आदि वह दलित कवि है,  जिनकी कविताओं में दलित समाज की वेदना,  व्यथा,  आक्रोश ,आकांक्षा और छटपटाहट साफ दिखाई देती है. उदाहरण के लिए जयप्रकाश कर्दम की कविता मेरे अधिकार कहां है कि कुछ पंक्तियां देखी जा सकती  हैं-


 तुम कहते हममें  यह नहीं

 तुम कहते हम सब भाई हैं

 फिर क्यों ऊंचे तुम मैं नीचा क्यों

 जाति वर्ण की खाई है

 तुम चाहो रामराज आए

 तुम श्रेष्ठ

 शूद्र मैं बना रहा हूं

 तुमको सारे अधिकार रहें 

 मैं वर्जनाओं से लड़ा रहूं.

                         ग़ज़ल   जो एक सामंतवादी विधा थी , हिंदी में आकर सर्वहारा वर्ग से जुड़ गई फारसी अरबी उर्दू की ज़्यादातर ग़ज़लें प्रेम प्रधान थीं. 

  यहां तक कि हिंदी में भी निराला,  त्रिलोचन,  रंग और शमशेर ऐसी ही ग़जलें लिखते रहे, लेकिन दुष्यंत ने गजल का लहजा बदला जो गजल श्रृंगार की थी वह गजल घर परिवार की बन गई. उसमें अपनी तकलीफों का बयान होने लगा जो ग़ज़ल  राज दरबारों में रह कर आई थी मनुष्य की जरूरतों से जुड़ गई उसमें सत्ता और सामंत के प्रति विरोध दिखाई देने लगा.

                       

हिंदी का दलित वर्ग भी इसी आशा असमानता का शिकार रहा, भेदभाव छुआछूत और पाकी  नापाकी के बने बनाए हुए मानदंडों ने उन्हें हमेशा हाशिए पर रखा वह जिस धर्म के थे उस धर्म के ठेकेदारों ने भी उन्हें खारिज किया.


                       हिंदी कविता से हिंदी ग़ज़ल की स्थिति इस अर्थ में भी थोड़ी सी  अलग है कि हिंदी दलित कविता में दलित कवियों ने ही प्रमुखता से अपने जज्बात रखें. इसलिए उसमें आत्म  पीड़ा भी दिखाई पड़ी.  हिंदी गजल में एक दो  को छोड़ दें तो मुश्किल से ही कोई दलित गजल कार मिलेंगे,  जो हैै वह उतने चर्चित नहीं है ऐसे भी हिंदी ग़ज़ल की बीमारी दस बीस  ग़ज़लकरों को लेकर ही चलने की है. उसमें भी गुटबाजी मौजूद हैं. जहां तक मुझे पता है हिंदी गजल में दलित

 और दलित वर्ग की स्थितियों को तलाश करता हुआ यह हिंदी का पहला रिसर्च आर्टिकल है.

                            हिंदी ग़ज़ल में कई ऐसे शेयर हैं जिसमें दलित के साहस, संघर्ष, दुख दर्द भेदभाव और शोषण उत्पीड़न का वर्णन किया गया है. हिंदी गजल का अध्ययन करने पर पता चलता है कि दलित चेतना को लेकर शायरी करने वाले अदम गोंडवी हिंदी के पहले गजलकार हैं वह स्वयं भी एक प्रकार से इसकी  घोषणा करते हुए एक कविता लिखते हैं-


 आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को

 मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको


 जिस गली में भुखमरी की यातना से डूब कर

 मर गई पुलिया बिचारी एक कुएं में डूब कर

                          हिंदी ग़ज़ल में अदम गोंडवी वैसे गजलगो हैं जिन्होंने कभी चापलूसी नहीं की बल्कि तल्ख तेवर अख्तियार किया. वह वास्तव में इस सदी के महान गजलकार और जन कवि हैं. चर्चित कवि ईश मिश्र मानते हैं कि अदम अन्य दलित दबे कुचले वर्गों के साथ कृषक वर्ग के भी बुद्धिजीवी हैं. वहीं  मधु खराटे ने माना है आदम ने सामाजिक विसंगतियों, आर्थिक विषमता,  गरीबी नैतिक पतन, दलित चेतना आदि का चित्रण भी अपनी गजलों  में खूब किया है.

 अदम की दलित विषयक खेलों में भी यह प्रतिरोध दिखाई देता है-


 तुम्हारी   मेज चांदी की तुम्हारा जाम सोने का

 यहां जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है

                         अदम हिंदी के पहले गजलकार हैं जिन्होंने एक -दो शेर नहीं बल्कि दलितों के हालात पर पूरी की पूरी मुसलसल ग़ज़लें  कही है देखें एक -दो गजल के कुछ शेर -


अंत्यज कोरी पासी हैं हम 

 क्यों कर भारतवासी हैं हम


 अपने को क्यों वेद में खोजें

 क्या दर्पण   विश्वासी हैं हम


 छाया   भी छूना    गर्हित है 

ऐसे    सत्यानाशी      हैं हम  


 धर्म        के ठेकेदार      बताएं

 किस ग्रह के आधिवासी हैं हम


 ऐसी ही उनकी दूसरी एक ग़ज़ल है-


 वेद में जिन का हवाला हाशिये पर  भी नहीं

 वे अभागे   आस्था   विश्वास लेकर क्या करें

 लोकरंजन हो जहां   शंबूक वध की आड़ में

 उस व्यवस्था का घृणित इतिहास  लेकर क्या करें

 कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए छण का यथार्थ

 त्रासदी,  कुंठा,  घुटन, संत्रास लेकर क्या करें


                         इस तरह की ग़ज़लें लिखना इतना आसान नहीं है इसके लिए अदम को गांव के ठाकुरों का विरोध सहनाा पड़ा.उन्हें ठाकुर जाति पर कलंक की पदवी दी गई अदम के ऐसे शेर भरे पड़े हैं.

                      हिंदी ग़ज़ल परंपरा में अदम को छोड़कर दलित विषय को लेकर बाजाब्ता शायरी करने वाले कोई नहीं है, लेकिन हिंदी के कई महत्वपूर्ण गजलकार हैं जिन्होंने अपनी शायरी में पूरी मजबूती के साथ दलितों की दशा और दिशा का चित्रण किया है,  जिसमें अनिरुद्ध सिन्हा,  रामकुमार कृषक,  विनय मिश्र, नूर मोहम्मद नूर,  कमलेश भट्ट कमल, रामचरण राग,  और नचिकेता आदि के नाम लिए जा सकते हैं. इनकी गजलें समाज के सबसे निचले और पिछड़े वर्ग तक पहुंची है. जिसने न मात्र दलित साहित्य को बल्कि गजल साहित्य को भी समृद्ध किया है.

                      असल में दलित शब्द को समझे बिना दलित चेतना को नहीं समझा जा सकता. दलित समाज का वह तबका है जो आर्थिक दृष्टि से वंचित,  शोषित, उत्पीड़ित,  दमित और समाज में समझे जाने वाले नीचे कुल का है. अपमान, बेबसी, उपेक्षा का दंश झेलता  हुआ यह बढ़ा हुआ है. इनका आशियाना वह मलिन बस्ती है जहां से शहर भर की गंदगी गुजरती है. दलित को छूने मात्र से कोई नापाक हो जाता है, और ऐसी मानसिकता उसे हाशिए पर ढकेल देती है. हिंदू वर्ण व्यवस्था में चारों जातियों में दलित की गिनती नहीं होती. इसके लिए अछूत, अंत्याजा, पंचम वर्ण आदि शब्द कर लिए गए हैं. इनकी परछाई से ही समाज नष्ट हो जाता है. इनके मरने पर देवता फूलों की बारिश करते हैं. यह ठाकुर के कुएं में पानी नहीं पी सकते हैं. 

दलित के लिए यह सारे हिदायत और बंधन हैं दलित लेखक जयप्रकाश कर्दम मानते हैं प्रत्येक दलित ने अपने जीवन में कभी ना कभी किसी न किसी रूप में अन्याय अपमान और उपेक्षा का दंश झेला है.

                              जातिगत उपेक्षा भेदभाव अपमान हेय समझने की मानसिकता अपने ही बीच के एक आदमी को हिंदी गजल स्वीकार नहीं करती.  शायर मानता है कि भेदभाव कभी ईश्वर नहीं सिखाता. यही प्रश्न रविदास और कबीर भी करते हैं, और यही सवाल हिंदी का ग़ज़लगो भी करता है. जब सब कुछ एक हैं तो उस तो उसे निम्न जाति का क्यों समझा जाए-


 जातों -पातों  का क्या करें कोई

 ऐसी बातों   का क्या   करें कोई


 यहां पर सब बराबर हैं यह दावा करने वाला भी

 उसे ऊपर    उठाता है      मुझे नीचे गिराता  है 

                                      - बल्ली सिंह चीमा


 क्यों महाजन की आंख है हम पर

 हम कोई  सूद की रकम तो नहीं

                 - बालस्वरूप राही


 पूरे ढांचे को बदलने   की जरूरत होगी

 अब ये हालात नहीं यूं ही संभालने वाले

                         - लक्ष्मी शंकर बाजपेई


 यह कहते आए हैं दाई से लेके साईं तक 

 कि कोई जन्म से छोटा बड़ा नहीं होता

                     - विजय कुमार स्वर्णकार

        

                               ऐसा नहीं है कि हिंदी गजल में सिर्फ दलित की पीड़ा ही है बल्कि कई शेर ऐसे भी हैं इसमें दलित वर्ग के बुद्धि, ताकत, संघर्ष का माद्दा और  राजनीतिक तथा सामाजिक चेतना भी दिखाई गई है. कुछ शेर इस संदर्भ में देखे जा सकते हैं-


 देश का है हाथ वह भी यह समझ

 अब दलित भी है नहीं कम देख ले

                  - मांगन मिश्र मार्तंड


 अपने हक के लिए    लड़ाई सीधे लड़ना है

 लौट ना आए फिर से वही दलालों वाले दिन

                                  - किशन तिवारी


 यह बात कोख से तय  कैसे हो गई आखिर 

 के मेरे    छूने से   गंगा को पाप     लगता है

                      - विजय कुमार स्वर्णकार


 उंगली जुबान हाथ नज़र इस्तेमाल कर 

 बेखौफ हो के वक्त से सीधे सवाल कर

                           - माधव कौशिक


 सदियों तक गम मन ही मन में पाले हैं

 पर अब   हम आवाज   उठाने वाले हैं 

                           - केपी अनमोल

                        गजल इशारों में बात करती है लेकिन स्थितियां हर वक्त इशारों में बात करने वाली नहीं होती. हिंदी गजल ने शुरू से अपना तल्ख तेवर अख्तियार किया है. हिंदी ग़ज़ल के कई ऐसे शेर हैं जिसमें बिना किसी छुपाव  के सीधे-सीधे सवाल पूछा गया है. कुछ शेर  मुलाहिजा हो-


 हवा मिट्टी या पानी पर सभी का हक बराबर था

 बिगड़ कैसे गया पर्यावरण फिर लोकशाही का

                                           - दिलीप दर्श 


 हिकारत  इस कदर अच्छा नहीं है

 दलित भी आदमी होते हैं साहब

                     - तनवीर साकित


 आपके ढंग में चौधराहट हैं

 इस तरह मशवरे नहीं होते

                 - महेश कटारे 


 आज भी तो है वही सामंतशाही मध्ययुग

 ले  गए औरत उठाकर रोकता कोई नहीं

                                   - राम मेश्राम


 देख भगवे    लिबास का जादू

 सब समझते हैं पारसा तुमको

                    - हस्तीमल हस्ती


 हमारी  मुश्किलें  मानो  हमारे  गम  को  तुम  समझो

कभी तो इस तरह भी हो मुकम्मल हमको तुम समझो

                                          - कमलेश भट्ट कमल


                               कहना न होगा कि हिंदी ग़ज़ल में दलित के कई रूप सामने आते हैं. दलित समाज में सबसे निचले पायदान पर हैं, लेकिन यह भी सच है कि अब दलितों की स्थितियां पहले से बेहतर हुई हैं. वोट की राजनीति ही सही उनके वजूद को समझा जाने लगा है गजल में कई ऐसे शेर मिलेंगे जिसमें यह बदला हुआ मंज़र दिखाई देता है-


 मिले हैं टिकट जबसे भूमाफियों  को

 दलितों    की बस्ती     बसाने लगे हैं

                                 -लवलेश दत्त


 टिकी है आंख गुब्बारे पे उसकी

 करेगा कुछ नया मतलू का बेटा

                     - अनिरुद्ध सिन्हा


 गर  नहीं सब का     तो मैं यह पूछता हूं आपसे

 यह जमीं  किसके लिए है आसमां किसके लिए

                                          - माधव कौशिक

दलित की बस्तियां होकर कभी गुजरो

मिलेगी हर जगह खुशबू मोहब्बत की

                                    - विकास


                      भाषिक कला की दृष्टि से दलित रचनाएं इंकार की भाषा है. इसकी भाषा,  साहित्य के मानदंडों से थोड़ी अलग है. इसमें गाली गलौज है,  इसके प्रतीक भी जो इस्तेमाल किए गए हैं वह भी वीभत्स और घिनौने हैं. इसका अपना कारण भी है कि दलित साहित्य में उसी परिवेश की बोलियों को जगह दी गई है, जिसमें दलित वर्ग जीते आए हैं. अक्सर दलित पर चर्चा करते हुए यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि गैर दलित साहित्यकारों की रचना दलित विमर्श में शामिल की जाए या नहीं. एक बड़े वर्ग का तर्क है कि गैर दलित ने दलितों पर सिर्फ लिखा है भोगा नहीं  है. उनकी बात मान लेने से ठाकुर का कुआं लिखने वाले प्रेमचंद से चतुरी चमार लिखने वाले निराला तक दलित साहित्य से खारिज कर दिए जाएंगे. तुलसीराम का अलग ही मत है वह पूरी तरह से ब्राह्मणवाद के खिलाफ खड़े हैं. दलित के बड़े चिंतक तुलसीराम की दृष्टि में दलित को बंधनों से अलग अपना रास्ता बनाना होगा. वह समयांतर पत्रिका के एक आलेख में लिखते हैं कि ब्रह्मणवादी जो व्यवस्था है उसको मानने वाले तो गैर ब्राह्मण जाति हैं. जिसमें दलित भी शामिल है. दलित भी पूजा उसी देवता का करता है जिस देवता को ब्राह्मण पूजता है,  वही कर्मकांड जो ब्राह्मण करता है वही दलित भी करता है. तो आप उसके खत्म होने के बात  कैसे कर सकते हैं. आज के दौर में दलितों कोअधार्मिक हो जाना चाहिए.

                          यह ठीक है कि दलित आज भी संघर्ष कर रहे हैं अपने स्वाभिमान की लड़ाइयां लड़ रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि आज दलित जातियां इसमें ब्राह्मण भी शामिल है,  का एक बड़ा वर्ग दलितों के साथ खड़ा है उनकी रचनाएं दलित विमर्श पर आ रही है. इसलिए दलित साहित्य से उनकी रचनाओं को खारिज करना या सीधे सीधे आरोप मढ  देना तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता. आज दलित के लिए पद दलित शब्द का भी इस्तेमाल हो रहा है यह अलग प्रश्न है कि पददलित सिर्फ दलित वर्ग हैं या अन्य ऊँचे समझे माने जाने वाले वर्ग भी. यही प्रश्न रैदास  भी पूछते हैं 'जन्मजात मत पूछिए का जात अरु पात ' और गज़लकार  दीप नारायण भी -


 कौन सी बात पूछते हो तुम

 क्यों मेरी जात पूछते हो तुम

                    - दीप नारायण

                           शायर यह मानकर चलता है कि दलित को लंबे दिनों तक उनके अधिकार से वंचित रखा गया स्लम  बस्तियों में रहने वाला यह बड़ा वर्ग आज भी शुद्ध हवा,  शुद्ध पानी, और शुद्ध भोजन की तलाश में है. उसकी जरूरतों में शिक्षा भी है और सम्मान भी वह सिर्फ वोट के लिए नहीं है अपनी जिंदगी सुधारने के लिए भी बने हैं. रामचरण राग ने  इस पर एक मुकम्मल ग़ज़ल लिखी है-


 दलित की चेतना को वोट का अधिकार है केवल

 किताबों के   अलावा तो दलित लाचार है केवल

 युगो से   गंदगी का बोझ   हम सिर पर उठाते हैं

 हमारी इस जिंदगी का बस यही आधार है केवल

 हमारे नाम पर होती    सियासत की हकीकत है

 यहां   बस भाषणों में ही दलित उद्धार है केवल

 हमें शिक्षा   सही लेकर   नए प्रतिमान गढ़ने  हैं

 बिना   शिक्षा हमारी   जिंदगी   बेकार है केवल

 भला अंबेडकर का हो दिखाया पथ नया हमको

 नहीं तो सांस जीवन पर रही बस भार है केवल

                                          - राम चरण राग 


               ऐसे ही  कुछ अन्य शेर भी देखने  योग्य हैं -

 कुचला गया है कौन यहां और कितनी बार

 गिनती में एक    पूरी सदी     ही मिसाल है

                                         -विनय मिश्र 

 वे ही पूजित वो ही  चर्चित ऐसा   वैसा मैं ही क्यों हूं 

 पांचों उंगली उनकी घी में भूखा प्यासा मैं ही क्यों हूं

                                         - विनय मिश्र


 उनकी   आंखों के   सपने को    सजा कर देखो

 हां यह दलित बस्ती है जरा नजर उठा कर देखो

                                     - ए. आर. आज़ाद 


 धंधा    ही राजनीति   है  झंडा     उठाइए

 जय भीम कह के ताज पे  कब्जा जमाइये 

                                     - राम मेश्राम

 मेरा तो घर भी जूठा कमरा जूठा आंगन जूठा

 मेरे घर  आई तो बोलो    कहां रहेगी गंगा जी

                              - ज्ञानप्रकाश विवेक

 गगनचुंबी   इमारत   उठ  रही है

 पचीसों  झुग्गियों की जान लेकर

                        - जहीर कुरैशी

 पानी तक वो बांट ले गए

 जिनसे थे संबंध लहू के

                    - उर्मिलेश

 जब हुई नीलाम     कोठे पर   किसी की आरजू

 फिर अहिल्या  का सरापा  जिस्म पत्थर हो गया

                                           - अदम गोंडवी

 हुई  बरसात तो  झुग्गी     ने सोचा

 अचानक अपने छप्पर की दिशा में

                            - जहीर कुरैशी

                           आलोचक ज्ञानप्रकाश विवेक मानते हैं गजल में कविता से कहीं अधिक चुनौतियां हैं. असल में गजल समझ आने वाली विधा है. यह ज्यादा प्रतीकों मिथकों और व्यंजनों में विश्वास नहीं करती. इसलिए पाठक जान जाता है कि शायर  क्या कहने वाला है. ग़ज़ल ने अपनी करवटें ली है. कभी समय से कटकर नहीं रही. गजल ने कभी बादशाहों  की बात की जमींदारों की बात की स्त्री पुरुष और बच्चों की बात की,  पर आज यही गजल दलितों वंचितों गरीबों और हाशिए के लोगों की बात कर रही है. यह वह प्रेमिका नहीं है जिसे प्रेम में  ही दिल लगता  है, या आंख,  नाक, और कान खोल कर चलने वाली प्रेयसी है. गजल में जहां बादशाहों  का गुणगान होता है, आज वहां दलितों और वंचितों की बातें भी है. यह वह विधा है जो हालात के मुताबिक कभी रुख  नहीं बदलती वो  उसके साथ शामिल हो जाती है. कुछ शेर उल्लेखनीय हैं -


 खुदा के वास्ते इस पर ना डालिए कीचड़ 

 बची   हुई है यही   शर्ट       आखरी मेरी

                             - ज्ञानप्रकाश विवेक

 झूठा बता के बाज  को बीवी को फाहिशा 

 हमने दलित विमर्श को अभिनव उछाल दी

                                       - राम मेश्राम

डेढ़ अरब की आबादी में किसको तेरी फ़िक्र पड़ी 

 जीता है तो जी ले यूं ही वरना तू भी जा कर मर

                                   - कमलेश भट्ट कमल

 कहां से और   आएगी     अकीदत की  वह सच्चाई

 जो झूठे बेर वाली    सिरफरी शबरी     से आती है

                                        - उर्मिलेश

 बूढा बरगद जानती है किस तरह से खो गई

 रमसुधी  की झोपड़ी सरपंच की चौपाल में

                         आज का  समाज  किसी की बात को यूं ही स्वीकार नहीं कर लेता,  बल्कि उसमें विरोध करने और अपने हक के लिए लड़ने की ताकत है-

 याचकों    के वेश में

 हम जिए इस देश में

 तुगलकी फरमान था 

 आपके    आदेश में

                       - अश्वघोष

 ठंडा   मत हो     जाने दो

 अपना रक्त तपाते  रहना

                    - चंद्रसेन विराट

                        अछूतानंद जिन्होंने आदि हिंदू धर्म नाम से एक संस्था चलाई और इस नतीजे पर पहुंचे कि दलित ही वास्तव में प्राचीन हिंदू हैं. उन्होंने एक कविता लिखी थी दलित कहां तक पड़े  रहेंगे जमीं के नीचे गरे रहेंगे- हिंदी गजल इस प्रश्न का उत्तर तलाशती है. अनिरुद्ध सिन्हा का एक प्रसिद्ध शेर है -


 बचपन में हर काम सुहाना सीख लिया

 दुनिया भर का बोझ उठाना सीख लिया

 पास्ता कलम किताब उठाने के बदले

 मैंने जूठा   प्लेट उठाना   सीख लिया

                              - अनिरुद्ध सिन्हा

                        इस संदर्भ में कुछ और शेर का भी अपना मूल्य है-

 नदियों के गंदे पानी को घर में निखार कर

 चूल्हा जला   रही है    वह पत्ते बुहार कर

                                    - डॉ भावना

 दलितों की इसी बस्ती से तो मैं भी गुजरता हूं

 कभी आते हुए मुंह पर नहीं रुमाल रक्खा  है

                        - डॉ.जियाउर रहमान जाफरी 

 मेरी ग़ज़लों में लैला है ना कोई हीर मौलाना

 मेरे अशआर  में है आदमी की पीर मौलाना

                                  - राजेंद्र तिवारी

 इस हिकारत की नजर ने जो मुझे तोड़ दिया

 सोचा हम       जैसों ने यह उम्र गुजारी कैसे

                          - विजय कुमार स्वर्णकार

 या दलित जाने या जाने इक नदी

 शहर भर की गंदगी धोने  का दुख


आपको     हासिल रही   ऊंचाइयां 

आप क्या जानें दलित होने का दुख 

                         -ए . एफ नज़र 

हम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुत 

तुमने बासी रोटियां  नाहक उठाकर फेक दी 

                               -दुष्यंत कुमार 

 हमारा खून    तुम्हारी शराब    क्या मतलब

 गरीब जिस्म अभी तक कबाब क्या मतलब

                              - नूर मोहम्मद नूर

 अगले कल के लिए जोड़ना भी नहीं

 रोज ही     मांगना रोज खाना भी है

                          - जहीर कुरैशी

 सर जो मुश्किल है तो फिर पैर ही काटे जाएं

 तय हुआ है कि    किसी से कोई ऊंचा न रहे

                               - महेशअश्क 

                     दलित लेखक मनोज सोनकर का मानना है कि दलित कविता का मूल मंत्र है हमें आदमी चाहिए.श्यौराज सिंह को विश्वास है कि वह वक्त जरूर आएगा-

 हम    सुबह के वास्ते आए हैं

 हम सुबह जरूर लेकर जाएंगे

                 दलित चिंतक कंवल भारती एक व्यक्ति की हत्या को पूरी समष्टि  की हत्या स्वीकारते हैं-


 शंबूक तुम्हारी हत्या

 दलित चेतना की हत्या थी

 स्वतंत्रता समानता और न्यायबोध  की हत्या थी


                        हिंदी ग़ज़ल हद उस विभाजन के खिलाफ है जो मनुष्यता के रास्ते में खड़ी है. हिंदी का शायर मानता है कि जब तक आखिरी पायदान पर बैठे व्यक्ति तक न्याय नहीं पहुंचता कुछ भी न्याय संगत नहीं हो सकता. कुछ शेर काबिले गौर हैं -


हम भी स्वाधीनता मनाते हैं

 पर दिया पेट  का जलाते हैं

                  - भवानी शंकर

 दर्द  , बेचैनियां, घुटन,  आंसू

 ये जहां मुझको और क्या देगी

                    - गिरिराज शरण अग्रवाल

 आदमी होगा मर गया गंगू

 फर्ज पूरा तो कर गया गंगू

                    - रामकुमार कृषक

 राहु को     सबने पासवां   यूं ही न कह दिया

 दुनिया में उसका कोई भी सानी न बन सका

                           - आर. पी घायल

 वह दर्द वह बदहाली के मंजर नहीं बदले

 बस्ती में   अंधेरों से भरे    घर नहीं बदले

                          - लक्ष्मी शंकर बाजपेई

 रहना पड़ा जो सांप के जंगल में हाशमी

 हमने भी इस शरीर को चंदन बना दिया

                       - फजलुर रहमान हाशमी

 बुझा देते हैं    जाकर  झोपड़ी में वह चिरागों को

 जमीदारों का यह रूतवा हवाओं से कहां कम है

                              - अनिरुद्ध सिन्हा

 पूछिए उस अभागन से उसका पता

 जिंदगी    को जिसे झुर्रियां खा गई

                        - अनिरुद्ध सिन्हा

 तुम्हारे पांव के  नीचे    कोई ज़मीन नहीं

 कमाल यह के फिर भी तुम्हें यकीन नहीं

                              - दुष्यंत कुमार

                   हिंदी गजल के कई शेर ऐसे भी हैं जिसमें शबरी और शंबूक को प्रतीक बनाकर अपनी बात कही गई है-

 थोड़ा     सच्चा   थोड़ा झूठा होता है

 वर्जित फल का स्वाद अनूठा होता है

 शंबूकों  को प्राण   गंवाने     पड़ते हैं

 एकलव्य   का दान   अंगूठा होता है

                               - राहुल शर्मा

                दलित और वंचित वर्ग पर कई तरह के सामाजिक बंदिश लगाए गए उन्हें मंदिर जाने से रोका गया शादियों में वह घोड़े पर नहीं जा सकते थे, अथवा आसन ऊंचा नहीं कर सकते थे. उनकी स्त्रियां पर्दा नहीं कर सकती थी. उन्हें अच्छे नाम से पुकारा नहीं जाता था. उच्च जातियां उनकी इज्जत आबरू ले ले तो वह अपराध नहीं था. हिंदी गजल ऐसे मसलों को भी उठाती है कुछ शेर देखें-


 उन्हें तो चाहिए ज्यादा मगर थोड़ी नहीं मिलते

 हमेशा ही निवाले हाथ को    जोड़े नहीं मिलते

 वह पैदल ही चला जाता रहा बारात  को लेकर

 अभी भी कुछ दलितों को यहां घोड़े नहीं मिलते

                                 - अंजनी कुमार सुमन


 फर्क इन्सान से इंसां का मिटाने देते

 मंदिरों में दलितों को भी तो जाने देते

                            - अमान ज़खीरवी 

                      इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हिंदी ग़ज़ल में दलितों के जीवन और उनकी समस्याओं पर गहराई पूर्वक विचार किया गया है. अपने लेखन शैली और प्रभावी ढंग के कारण हिंदी गजल ने दलित साहित्य की समृद्धि में अपनी प्रभावपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है.



ज़ियाउर रहमान जाफ़री
असिस्टेंट प्रोफेसर 
स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग 
मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज गया, बिहार - 803001
मोबाइल -9934847941



December 06, 2021

बिहार शराब बंदी की धून सारे जनहित मुद्दे भूल Bihar sharab bandi

शराब बंदी की धून सारे जनहित मुद्दे भूल 

Bihar sharab bandi


1 अप्रैल 2015 से बिहार में शराबबंदी को सख्त कानून के साथ लागू किया गया।जिसे सर्वसम्मति से सभी ने सराहा भी था और अपार समर्थन भी दिया था लेकिन बिहार के लिए यह अभिशाप बनेगी यह किसी ने सोचा भी न था।आज तो यह स्थिति है कि जनहित के मुद्दे सारे गायब हो रहे और सिर्फ शराब पर सरकार और विपक्ष सड़क से विधान सभा तक और सोते जागते यही धून बजाते फिर रहे हैं।
Sharab

जहां तक शराब छोडने का सवाल है वह तो कुछ कम अवश्य हुआ लेकिन ड्राय नशा गाजा चरस और स्मैक का आदि आज बिहार का युवा वर्ग हो चला है।किस ओर ले जाना चाहते है बिहार को ।अगर नशा का कारोबार ऐसे फलता फूलता रहा तो वो दिन दूर नही जब यहां के 70% युवा एक गहरी खाई की तरफ धकेले जा रहे हैं।
          

बिहार शराब बंदी Bihar sharab bandi


इस बार मॉनसून सत्र में यह मुद्दा बिहार विधान सभा में छाया रहा जबकि रोजगार मंहगाई और जनहित के मुद्दे प्रायः गायब ही रहे।सरकार से जनता आशा रखती है कि उसके रोजमर्रा के जीवन स्तर के सुधार के लिए सरकार और विपक्ष काम करे न कि शराब और गाजा में सरकारे उलझे।

बिहार में शराब बंदी है। इसके सख्त कानून भी हैं लेकिन यहाँ शराब की कोई कमी नही है।ऐसा हम नही कहते शाम होते नशा करने वाले का जूनून बोलता है। वैसे जगहों को जहा मनमानी रेट पर शराब का गोरख धंधा फलता फूलता है।आखिर इसका प्रश्रय कहाँ और कैसे संभव है। जब तक प्रशासनिक चूक न हो। स्कूल कालेज के बच्चे महिलाएँ धरल्ले से उन माफियाओ का काम कर रही है जो वेरोक टोक मनमाना धंधा चला रहे हैं आखिर कैसे? 

Bihar me sharab bandi बिहार में शराब बंदी

आज बिहार के हर घर में एक स्मगलर पैदा हो गया है विगत चार पाँच वर्ष में  विशेषकर बच्चे?  क्योंकि हमारा राज्य बंगाल,  नेपाल, झारखंड और उत्तरप्रदेश से सटा हुआ है बच्चे उन राज्यों से शराब लेकर अपने गांव शहर में आसानी से बेच रहे हैं जिससे उन्हें अच्छी कमाई होती है। यह कमाई प्रशासन की नजर में भी है पर उसकी मजबूरी भी शायद शराब ही है जो शाम होते ही परवान चढ़ने लगती है और वेडरूम में पहुँच जाती है।

सरकार के स्तर पर काफी प्रयास किए हैं लेकिन दो चार को छोड सभी शायद इसके आदि है जिसकी वजह से इस धंधा को रोक पाना संभव नही हुआ है ।हाँ  कमी और एक डर अवश्य बना है कोई प्रदर्शन नही करता लेकिन आज भी चोरी छिपे लोग पी रहे है।जो प्रशासनिक विफलता और असमर्थता को उजागर करता है।जिसका कारण अपनो का प्रेम या शराब से प्रेम हो सकता है।शराब बंदी एक सार्थक पहल थी। जिसे सभी ने सराहा था,  लेकिन वेतहाशा युवा वर्ग की सक्रियता और तस्करी ने प्रशासनिक मेहनत को फीका कर विवश कर दिया है।जिसमें कोई न कोई अपना रिश्तेदार ही निकल जाता है जो शाम का नशा सुबह उतरने का इंतजार भी करता है।प्रशासन कठोरता के साथ कोमलता भी बरत रही जो इस स्थिति से स्पष्ट होता है ।एक नींव जो 100 रू की है बिहार में 300-400 रू में मिलती है अगर खर्च 100 रू कर दि जाय फिर भी एक नींव पर 200 रू की कमाई होती है स्थानीय प्रशासन का अथवा बिना किसी मिली भगत का ऐसा घिनौना मजाक भला सरकार या प्रशासन कैसे कर सकती जिसमे सारे युवा स्मगलिंग कर सके ।ऐसे बंदी से वेहतर है ऐसे सरकारी दूकान खुलवाये जाएँ जहा सरकारी रेट पर एक सीमित मात्रा में शराब पीने वाले को मिल सके।ताकि युवा तस्कर न बनकर अपना  भविष्य दूसरी ओर ले जाएँ ।
                                
                                लेखक - आशुतोष 
                                 पटना बिहार
October 28, 2021

बढ़ती सब्जीयों की कीमत से आमजनों में आक्रोश/Sabjiyon ki kimati me vridhi/महंगाई/badhati Mahngai

 बढ़ती सब्जीयों की कीमत से आमजनों में आक्रोश


हरी सब्जी आलू प्याज की वेतहाशा मूल्य वृद्धि से आमजन को खासी परेशानियों का सामान करना पड़ रहा है।जहाँ प्याज की कमत 70-80 रू• आलू 50 तो हरी सब्जी 80 पर केजी बिक रही है।

एक तो लाकडाउन की मार और अब वेतहाशा मूल्य वृद्धि ऐसा लगता है आमजन नमक रोटी खाने पर विवश हो जाएंगे ।बाढ और सुखाड़ तो यहां प्रत्येक वर्ष आती है लेकिन इस तरह की वेतहाशा उछाल कभी नही हुई।

जो लोग रोज कमाते है उनके कमाई का साधन भी पर्याप्त नही है जबकि यह वेतहाशा मूल्य वृद्धि एक गहरी मुसीबत बन गया है।आखिर कम कमाने वाला दो- तीन सौ की सब्जी कैसे रोज खरीदे? आज का यह सबसे अहम और चुनौतीपूर्ण मसला है जिस पर सरकार के स्तर पर अविलंब ध्यान देने की जरूरत है।

आमजन का फल तो नही पर सब्जीयां उनका मुख्य  आहार है पर वो भी उनकी पहुँच से बाहर जाता दिख रहा है। ऐसे हालात के आखिर जिम्मेदार कौन? क्यों नही कोल्ड स्टोरेज में पर्याप्त मात्रा में स्टाक रखे गये आखिर सरकारें क्यों सोती रही हैं ।

विगत एक माह से यह स्थिति बरकरार है और अभी बाजार की स्थिति से नही लगता कि किसी तरह की मूल्य घटने के चांसेज है ।आखिर यह मंहगाई की मार कबतक पड़ती रहेंगी जबकि सरकार के तमाम मशीनरी चुनाव में मस्त हैं।

                                  आशुतोष 
                               पटना बिहार
October 28, 2021

आर्थिक आधारित जनगणना सार्वजनिक हों/Arthik janganana/Bhartiy Janaganana/

 आर्थिक आधारित जनगणना सार्वजनिक हों

            आर्थिक जनगणना


जनगणना अर्थात आबादी की गिनती वो तो सभी सरकारें करती आ रही है और होनी भी चाहिए, लेकिन विगत कुछ वर्षो से एक नई वहस छिडी है वो है जातिगत जनगणना की।क्षेत्रीय पार्टीयों का बढ़ता दबाब शायद ऐसे मुद्दे को सार्वजनिक कर सकता है।आज तक 1931 के बाद जाति आधारित जनगणना सार्वजानिक नहीं हुई आंकडे तो होते है पर वह सार्वजनिक नहीं होती शायद यही उन छोटे छोटे दलो को कुंठित कर रही है ।जातिगत पार्टीयां ही ऐसे मांगो को लेकर ज्यादा उत्साहित होती रही है,जबकि नेशनल पार्टीयां ऐसे मुद्दों से परहेज करती रही हैं। इसी को समझकर 1941 में जातिगत जनगणना की गयी लेकिन आंकडे सार्वजनिक नही हुए 2011 में भी सामाजिक आर्थिक और जातिगत जनगणना हुई लेकिन आंकडे सार्वजनिक नही हुए। सियासत के लिए जातिगत आंकडा जरूरी होता है 1931 से प्राप्त आंकडे के आधार पर आज भी सियासत होती है।मौजूदा स्थिति और भी भयावह है ऐसे में जाति आधारित जनगणना अगर सार्वजनिक कर दिए जाए तो सियासत भी खूब होगी और सामाजिक कटुता भी बढ़ेगी, इसलिए सभी सरकारे ऐसे मसले को भुलाये रखना ही जरूरी समझेगी।

देश के सभी राज्यो मे क्षेत्रीय पार्टीयों की भरमार है जो किसी न किसी जाति विशेष का नेतृत्व करती है। उनके लिए यह आंकडा तुरुप का इक्का सावित हो सकता है शायद यही सोचकर क्षेत्रीय पार्टीयां केन्द्र सरकार पर दबाव बनाती रही है।

दरअसल यह पार्टी नही एक वर्ग-विशेष का नेतृत्व है जो कि सिर्फ अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सकने से मतलब रखती है।जबकि इनकी मांग यह होना चाहिए था कि सरकार को आर्थिक कमजोर के आंकडे सार्वजनिक कर उनको सभी सरकारी योजनाओ का लाभ मिले इस पर ध्यान देने के लिए रास्ते बताते । देश की एक बडी आबादी आज तंगहाल है उनकी आर्थिक हालत खराब है ऐसे में जातिगत आंकडे का औचित्य क्या?शायद ऐसे जातिगत पार्टीयां ही फूट डालो और राज  करो की नींव रखती है।

एक पढा लिखा नौजवान आज के परिवेश में जाति से मतलब कतई नही रखता लेकिन प्रदेश के नामी गिरामी लीडर प्रदेश का मुखिया उपमुखिया जाति विशेष की मांग करता है ऐसे प्रदेश का उत्थान कैसे संभव है ।जाति एक सामाजिक विध्वंस का हथियार है जिससे राजनीति को दूर किया जाना चाहिए। जबतक जातिगत मानसिकता होगी सामाजिक और आर्थिक पतन होता रहेगा। इसलिए केन्द्र सरकार को गंभीरतापूर्वक विचार कर आर्थिक आधारित आंकडे सार्वजनिक करनी चाहिए।ताकि वंचित लोगो तक सरकारी लाभ और अधिक पहुँच सके।।
                                       आशुतोष 
                                      पटना बिहार 
October 13, 2021

बढ़ता भारत घटती इंसानियत Badhta Bharat ghatati insaniyat

 बढ़ता भारत घटती इंसानियत 



जनाब ये बढ़ता हुआ भारत है जहां खाद्य तेल 200 डीजल पेट्रोल 110 और रसोई गैस1000 न हो तो भारत का नाम कैसे रौशन होगा ।चाय दुकान पर एक सज्जन ने यह बात बडे अदब से कही न्यू इंडिया धनवान हो गया है ।जहां की जीडीपी 7•5 से लगातार घटकर दो ढाई पर है। 

नये भारत की रहन सहन बदल गयी है बोलने के अंदाज बदल गये हैं आखिर हाफ पैट का प्रचलन का असर अब साफ दिख  रहा है अब तो ताऊजी भी हाफ पैंट पहनने लगे हैं ।गिरती सभ्यता की घिनौनी कहानी आये दिन अखबारो मे पढने को मिल रही है । वो कचहरियो की लंबी कतारें फैशन से लैस होकर एक फाइल में सिमट गयी है।यह सब बढते भारत में घटते रिश्तो का कमाल है जनाब ।

एक मोहतरमा ने तो कमाल ही कर दिया खुद ही बढ़ते भारत का दामन थाम लिया है और ऐसी ऐसी मनगढंत तरकीब जिसका कोई वजूद न हो वैसा ही भ्रम इस बढते भारत के लिए बना लिया है ।अच्छा है ।शायद कुछ तसल्ली दे सके खुद को ।अजीब विडम्बना रही है इस बढते भारत की । अमीर बढते ही जा रहे है और आम जन गिरते ही जा रहे है।

जी हजूरी और चमचागिरी की सारे हदें पार कर आखिर किस भारत का सपना साकार करेगे ।अरे भाई ऐसे थोडे न भारत बढेगा भारत को बढाना है तो गरीबो को बढाना होगा आर्थिक औद्योगिक विकास करना होगा तभी सही मायने में बढती भारत की नीव होगी।।

आजकल एक चुनिंदा शब्द मिला है भक्त अरे मुर्ख इस कृषि प्रधान देश में कितने युवा खेत की मिट्टी लगाते हो शरीर में ! सभी को नौकरी चाहिए! तो राशन कैसे सस्ता होगा उपजेगी कम और खपत हो बहुत तो ऐसी मंहगाई सहनी होगी । 

सवाल सिर्फ इतना ही नही है।जमाखोरी से भी देश और दुनिया परेशान है।ये पैसा बोल रहा है गरीबो का दिल पिघल रहा है पेट जल रहा है इससे किसी को क्या वास्ता कही मारपीट हो जाय थोडी हिसा हो जाय फिर देखिए नेताओ का घटना प्रदर्शन और मगरमच्छ के आंसू उसके लिए 10 राज्य लांघकर भी आ जाएंगे आंसू बहाने।।

मुद्दा अनेक है पर मारपीट और हिंसात्मक मुद्दे हर पार्टीयां गून गूनाती रही है। अभी लखीमपुर उसका उदाहरण है।भूख मंहगाई वेरोजगारी पर इनके एक बोल नही निकलते और बढते भारत का सपना सजाते है ।आज देश में वेरोजगारी दर सबसे ऊंचे पायदान पर है मंहगाई चरम पर है।कई लोग आज भी भूखे सो जाते है ।इसलिए बंद करो ऐसे प्रवचन को जिसे सुनकर अनायास ही मन जहर हो जाता हो।।
                                          आशुतोष 
                                         पटना बिहार 
October 08, 2021

देश के पहले मुस्लिम भारतीय वायु सेना चीफ़ Bhartiya Vayu sena diwas

 देश के पहले मुस्लिम भारतीय वायु सेना चीफ़

भारतीय वायुसेना दिवस 

इदरीस हसन लतीफ़

आज भारतीय वायुसेना दिवस है। इस मौके पर हम आपको एक भारत के पहले मुस्लिम चीफ़ चीफ के बारे में बताने जा रहा है।हैदराबाद में एक संपन्न परिवार में 9 जून1923  जन्मे। वह दूसरी आदमी एंड के दौरान भारतीय वायु सेना की स्वयंसेवी रिजर्व  में शामिल हुए । कराची में तटीय उड़ान में शामिल होने के बाद , उन्होंने रायल एअर फोर्स साथ ब्रिटेन में एक वर्ष बिताया । नम्बर 03 भारतीय वायु सेना स्कवार्डन हिस्से के रूप में बरता अमिताभ में सेवा की । देश के विभाजन के बाद , उन्होंने  भारतीय वायु सेना के साथ रहने का निर्णय लिया। उन्होंने स्कवार्ड्रन 4 की कमान संभाली और 1950 में पहली गणतंत्र दिवस परेड के दौरान फ्लाई-पास्ट में स्क्वाड्रन का नेतृत्व किया। उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में भी के एक स्क्वाड्रन की कमान संभाली ।

इदरीस लतीफ ने 26 जनवरी 1950 को भारत के गणतंत्र बनने के बाद नई दिल्ली में भारत के पहले फ्लाई-पास्ट का नेतृत्व किया था. द्वितीय विश्व युद्ध के एक अनुभवी एयर चीफ लतीफ ने जगुआर स्ट्राइक एयरक्राफ्ट की खरीद में भी अहम किरदार अदा किया और 1 मई 2018 को वो इस दुनिया एक फानी को छोड़ कर जन्नत मकीं हो गए।


इदरीस लतीफ ने 26 जनवरी 1950 को भारत के गणतंत्र बनने के बाद नई दिल्ली में भारत के पहले फ्लाई-पास्ट का नेतृत्व किया था. द्वितीय विश्व युद्ध के एक अनुभवी एयर चीफ लतीफ ने जगुआर स्ट्राइक एयरक्राफ्ट की खरीद में भी अहम किरदार अदा किया था।
        पाकिस्तानी एयरफोर्स में मौजूद कमांडिंग ऑफिसर स्क्वाड्रन लीडर असग़र ख़ान और एक तेज़तर्रार पायलट लेफ्टिनेंट नूर ख़ान के अच्छे दोस्त थे।एयर चीफ मार्शल लतीफ़ ने अपने आधिकारिक प्रोफाइल में लिखा है "जब विभाजन के बाद जब सशस्त्र बलों का विभाजन हुआ तो एक मुस्लिम अधिकारी के रूप में लतीफ को भारत या पाकिस्तान दोनों में शामिल होने के विकल्प था। जिसको लेकर इदरीस बहुत स्पष्ट थे कि उनका भविष्य भारत के साथ है. भले ही उनके दोनों अच्छे दोस्त असग़र और नूर ख़ान भारत को छोड़कर पाकिस्तान वायु सेना में शामिल हो गए थे लेकिन लतीफ ने भारत को छोड़ने से इनकार कर दिया था। भारतीय वायु सेना प्रमुख के रूप में लतीफ वायु सेना के उपकरण और आधुनिकीकरण योजनाओं में पूरी तरह से शामिल थे। उस वक़्त की सरकार को लतीफ़ ने ही जगुआर स्ट्राइक एयरक्राफ्ट की खरीद को मंजूरी देने के लिए राजी किया था. जगुआर स्ट्राइक एयरक्राफ्ट एक ऐसा प्रस्ताव था जो 8 साल से ज्यादा वक्त से पेंडिंग पड़ा हुआ था।    सूत्र के मुताबिक उस वक़्त की सरकार को लतीफ़ ने ही जगुआर स्ट्राइक एयरक्राफ्ट की खरीद को मंजूरी देने के लिए राज़ी किया था।उन्होंने। चीफ़ के तौर पर मिग-23 और मिग-25 विमान के लिए रूसी सेनाओं से बातचीत की. जिसके बाद में मिग-23 और , मिग -25 विमान को इंडयिन एयरफ़ोर्स में शामिल किया।1981 में अपने रिटायरमेंट के बाद लतीफ ने महाराष्ट्र के राज्यपाल और फ्रांस में भारतीय राजदूत के पदों पर काम किया था।
जब भी एयरफोर्स के इतिहास की बात की जायेगी तो इदरीस हसन लतीफ  का नाम अवश्य लिया जाएगा।क्योंकि उन्होंने एयरफोर्स के  कई अहम पदों पर काम किया था और आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था।

उनके उत्कृष्ट कार्यों के चलते भारतीय वायु सेना के इतिहास में  उनका नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा है।

ए एच इदरीसी
कानपुर

June 20, 2021

राजनीति में बढ़ती महत्वाकांक्षा गिरती नैतिकता (Rajniti me badhati mahatvakanksha girati naitikata

 राजनीति में बढ़ती महत्वाकांक्षा गिरती नैतिकता


सभी को अमीर होने का एक जुनून चढ़ा है सभी को कुर्सी पर ताबीज होना है और फिर बंदरबांट का खेल खेलना है।यह आज की राजनीति और उनके चरित्र हैं।

ताजा उदाहरण हम सबने लोजपा का देखा।जहां नैतिकता और शिष्टाचार का पतन चरम सीमा पर था।यह कैसी ओछी परिदृश्य भारतीय राजनीति में उभर रही है। जहां एक पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अगर मिलने जाय तो दरवाजा न खुले । एक समय वह था जब राजनीति के घोर विरोधी भी जब कहीं मिलते थे तो दुआ सलाम और कुशल क्षेम आदर भाव के साथ गले मिलकर पूछते थे। देश और क्षेत्रीय समस्याओं के निराकरण के उपायों पर बात करते थे। हर छोटी से छोटी समस्या का हल तलाशा जाता था। तब कहीं जाकर हमारा लोकतंत्र प्रगाढ़ और हम इतने विकासशील हुए हैं।आज का परिदृश्य भिन्न है और मानसिकता पृथक सब अपने आप में सुपर बाॅस है। सबकी सिर्फ महत्वाकांक्षा
 है । जनता की आकांक्षा या उनकी नैतिकता कहीं बची ही नहीं।जो आगे बढाता है यह सिर्फ उसे ही तबाह करता है।

वैसे यह चूहे बिल्ली का खेल तो पहले भी होता था लेकिन इस कदर हावी न था लोग पर्दे के पीछे इन तमाम चीजों को अंजाम देते थे।आज विलासिता में डूबे लोगो पर नशा इस कदर हावी है कि वह इन सारी मर्यादाओं को भूल चुके हैं।

आदिकाल की बात हो या वेद पुराण की अथवा ग्रंथों की सत्ता के लिए दकियानूसी चाल होती रही है जिसका उदाहरण महाभारत से लिया जा सकता है जिसमें एक ओर छल, कपट,हत्या, द्वेष,व  घृणा के अनेक  उदाहरण है तो दूसरी ज्ञान,मर्यादा, राजधर्म, धर्म और गीता के उपदेश भी हैं। 

सवाल यह उठता है कि हम किस ओर जाएं और समाज को किस ओर ले जा रहे हैं जाहिर है व्यक्ति से ही समाज है। जब देश की पार्टीयां अगर मर्यादा का पालन नही करेगी तो फिर उस देश का क्या होगा और वह किस ओर जाएगी।विगत आठ दशक से हम स्वतंत्र है लेकिन आज भी वही ढाक के कितने पात को परिभाषित कर रहे हैं।आखिर क्यों? इस देश को कभी भी साफ सुथरा राजनीतिक माहौल नही मिला जिसकी परिकल्पना सरदार पटेल,और लालबहादुर शास्त्री जी जैसे नेताओं ने की थी।सबके सब अपने आप को चमकाने में और कुर्सी बचाने में लगे रहे हैं।

आज यह विकट परिस्थिति भी परिवारवाद का राजनीति में वर्चस्व का एक ओछी उदाहरण हमारे सामने परिलक्षित की गयी जिसे कोई भी ज्ञानी मानव अच्छा नही कह सकता।
                                             आशुतोष 
                                           पटना बिहार 


June 15, 2021

तड़पते लोग विलखते परिजन जिम्मेदार कौन --? Korona se marati janata jimmedar koun

 तड़पते लोग विलखते परिजन जिम्मेदार  कौन --?


भारतीय संविधान में मूल अधिकारों का हनन एक संगीन मामला बन जाता है जब परिवार में किसी की मौत हो और उसके अंतिम दर्शन तक न हो।मीडिया और सोशल मीडिया पर दर्द विदारक रिपोर्टो ने क्रूरतापूर्ण रवैये के इस प्रचंड रूप का आये दिन वर्णन किया है।लेकिन सिस्टम का इसपर भी कोई प्रभाव पड़ता नही दिखता।वैसे देखा जाय तो ऐसे कितने परिवार होगे जिनके अपने अस्पताल गये तो फिर उनसे पुनः भेंट तक नही हुई।यह कैसी व्यवस्था और कैसा इलाज क्या देश की संविधान पीठ मूक दर्शक बनी रहेगी?क्या यह मानवाधिकार का हनन नही है?जब तमाम राज्य सरकारें और केन्द्र सरकारें जानती थी कि कोरोना विस्फोट कभी भी हो सकता है तो पहले से ऑक्सीजन और दवाईयों स्टाक क्यों नही किया गया?कई ऐसे प्रश्न हैं जो आने वाले समय में पूछे जाएँगें।

स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता राज्य सरकारों की कलई खोलता नजर आने लगा है ।बहुत सारी समस्याएं हैं जो की चरम पर है। देश की तमाम सरकारें इस महामारी से निपटने के लिए कोई इंतजाम पहले से क्यों नहीं किया? सरकारें सिर्फ चुनावी रैली करेंगी जबकि देश सुनसान होता जा रहा है क्या यही लोकतंत्र है? देश की संविधान पीठ की कई फैसले को भी राज्य सरकारे नही मानती क्या संवैधानिक व्यवस्था का सरकार पालन नही करेंगी जिसमें नागरिको की रक्षा सुरक्षा औषधि और मानवाधिकार की रक्षा के साथ न्याय सर्वोपरि है।

आज देश मे तकरीबन 4 लाख नये मरीज और 3 हजार रोजाना मौत आखिर किसकी नाकामी है।क्या जब सबकुछ ऑन लाइन हो सकता है तो चुनाव जैसी जटिल प्रक्रिया को हरी झंडी क्यों दिया गया? आज बिहार मजदूरों की वजह से नहीं अपितु चुनाव की वजह से कोरोना का हब बना हुआ है? धीरे धीरे यह जहर फैलता चला गया ।तमिलनाडू की भी यही स्थिति है और आने वाले समय में बंगाल और असम की भी यही स्थिति होने वाली है? जब पिछले एक वर्षों से सभी शिक्षण संस्थानों को बंद कर दिया गया और ऑनलाइन किया गया तो प्रचार और रैली जैसी विशाल भीड़ को रोकने की व्यवस्था क्यों नही की गयी? प्रचार ऑन लाइन क्यों नही किया गाय? क्या देश में जान माल की सुरक्षा सर्वोपरि है या चुनावी प्रक्रिया?


                                           आशुतोष 
                                        पटना बिहार
June 04, 2021

पर्यावरण और मानव Paryavaran or manav

 पर्यावरण और मानव 

---------------------------
एक ना टूटने वाला सम्बन्ध "पर्यावरण का मानव से, मानव का पर्यावरण से" दोनो एक दूसरे के पूरक यह प्रायः हम सभी जानते हैं लेकिन फिर भी हमारी पर्यावरण के प्रति उदासीनता जगजाहिर 
है।

मानव जीवन प्रकृति पर निर्भर है ।प्रकृति से मिलने वाली पाँच तत्व जिससे हमारा शरीर भी है हवा,  जल,  अग्नि,  धरती आकाश ये ऐसे तत्व है जिसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।जिस तरह मनुष्य का शरीर पाँच तत्वों से बना है। ठीक उसी प्रकार हमारी प्रकृति भी हमहीं से बना और हमारे लिए ही बना है।जिसकी देखरेख और उसके विकास की जिम्मेदारी भी हमारी ही है। 

हमारे पूर्वज हमें एक अमूल्य उपहार प्रकृति के रूप में देकर हमें गये हैं  जो आज हमपर रूष्ठ है ।आखिर क्यों न हो?  हमने उसके साथ हमेशा सौतेला व्यवहार किया है।विकास की अंधी रफ्तार ने प्रकृति का दोहन हमेशा किया।अंधाधुंध पेड़ काँटे गये।पहाड़िया तोडी गयीं, नदी को बाँधा गया ये सभी कार्य ने प्रकृति की दिशा को बदलकर रख दिया और ब्रेक लगा दी प्राकृतिक चक्रो पर।यहीं से उत्पन्न हुआ हमारी विनाशलीला कभी बाढ़,  सूखाड़,  भूकंप,  आँधी के रूप में प्रकृति के द्वारा विनाश ताण्डल जारी है। प्रत्येक वर्ष प्रकृति के प्रकोप से लाखों जाने जा रही है।

इन बढ़ते प्रकोप से बचने के लिए ही संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 5जून 1973 को पर्यावरण दिवस घोषित किया और पर्यावरण संरक्षण के प्रति विश्व को जागृत करने लिए इसे पूरे विश्व में मनाने की अपील भी की तभी से यह पूरे विश्व में मनाया जाने लगा।विभिन्न सेमिनारों लेखो कवियो के द्वारा पर्यावरण को लेकर लंबे लंबे भाषण लिखे और सुने जाते हैं  लेकिन प्रकृति का दोहन आज भी वदस्तूर जारी है ।जो अब विकट परिस्थति में पहुँच गया है।जिसका प्रमाण हमें ग्लेशियर का तेजी से पिघलना, भूजल स्तर का दूर होना, हवा का प्रदूषित होना समय चक्रों का अनायास बदलना आदि से मिलता है।

इस अलौकिक संसार में प्रकृति ही है जो सभी के साथ समान व्यवहार करती सभी को निशुल्क सब कुछ देती है जो उसके पास है।उसके संदेश मानव के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं जिससे उसे हमेशा सीखने की जरूरत है।

आज विश्व के बड़े बड़े शहर की हवा प्रदूषित है पीने का जल प्रदूषित है और तो और खाने वाले फल सब्जी भी बढ़ते रासायनिक प्रयोगो से दूषित है।जिसके कारण कई जान लेवा रोग से हमें लड़ना पड़ता है।एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे बीमारी 10 में से 8 प्रदूषित जल अथवा हवा या और किसी प्रदूषित इन्फेक्शन के कारण होते हैं यह आँकड़ा वेहद चौकाने वाला और डरावना है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कईबार बढते प्रदूषण को लेकर गहरी चिंता जताई तथा सभी को इसके स्तर में सुधार के प्रयासो पर जोर देने की अपील की है।विभिन्न देश-प्रदेश की सरकारो ने भी पर्यावरण सुधार के प्रयास बड़े पैमाने पर किये है ।जगह जगह रोड किनारे,  रेलवे किनारे अनेक वृक्षारोपन कार्यक्रमों द्वारा पेड़ लगाये जा रहे है। हरित क्रांति पर जोर दिया जाने लगा है यह एक शुभ संकेत है लेकिन पेड़ कटते करोडो में लगते हजारो में इससे हम पर्यावरण प्रदूषण कम नही कर सकते अपितु लाख कटे तो करोड लगे ऐसी सोच बनानी होगी और सभी को पर्यावरण के लिए करना होगा। प्रकृति से ही मानव है और मानव से प्रकृति।।

                        आशुतोष 
                      पटना बिहार 
June 04, 2021

विधायिकाऔर कार्यपालिका को राह दिखाती हमारी न्याय प्रणाली Vidhayika or Karypaloka

 विधायिका और कार्यपालिका को राह दिखाती हमारी न्याय प्रणाली

-----------------------------------------------‐--------‐-

कहते हैं घर की बुनियाद अच्छी हो तो छोटे मोटे तूफान थाम लेते हैं। घर का अगर एक सशक्त बीम हो तो बाकियों को भी सशक्त और आर्दश के साथ रहना सिखाती है। इस महामारी काल में देश के चार स्तम्भों में से एक हमारी संवैधानिक व्यवस्था इन दिनों एक मजबूती की तरह सभी स्तम्भों को राह दिखाती नजर आ रही है।उनकी सक्रियता ने देश की इस समय चरमराई स्वास्थ्य सेवाओं पर अपनी पैनी नजर से कार्य के तौर तरीके पर वेहद गम्भीर टिप्पणी कर सुधरने का मौका दिया है।दरअसल हमारे देश में संसाधनो की कोई कमी नही है।कमी है तो सिर्फ नैतिक जिम्मेदारी का निर्वहन करने की।

हाल के दिनों में राज्य, केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग पर की गयी उनकी सख्त टिप्पणी ने एक बार सभी को सोचने का और अपनी अपनी कर्तव्य  निभाने का अवसर दिया है।याद कीजिए बिहार का वह दौर जब पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार के रवैया से सख्त नाराज होकर इसे जंगलराज की उपमा दी थी ।ठीक उसी तरह हाल के दिनों में मौजूदा सरकार के स्वास्थ्य विभाग को सेना के हवाले करने की सख्त टिप्पणी की है शायद इन टिप्पणी का कुछ असर सरकार में बैठे हुक्मरानो को हो।इसी तरह चुनाव आयोग को भी आडे हाथ लेते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि जब चुनाव प्रचार में भीड हो रही थी तो क्या वे दूसरे ग्रह पर थे।

आज देश की हालत किसी से छिपी नही है।सिर्फ प्रचार करने के लिए देश के मंत्री नहीं बनाये जा सकते।चंद कागजी आंकडे देश की विकास का पैमाना नही हो सकता । देश की जनता को रोजी, रोटी,और स्वास्थ्य अहम कार्य माना जाता है ।देश में वेरोजगारी सबसे ऊँचे स्तर पर,जीडीपी का ह्रास लगातार जारी और मँहगाई चरम पर फिर ऐसे में महामारी ने संवैधानिक पीठ को मजबूर कर दिया क्योंकि वह न्याय की देवी आखिर कबतक चुप रहेगी जिसपर आम आवाम न्याय का भरोसा करती है। देश की शीर्ष अदालतों ने कई मौको पर मोदी सरकार को कड़ी फटकार लगायी है और राज्यों को ऑक्सीजन, दवा, वेंटिलेटर और एम्बुलेंस जैसी आवश्यक सामग्री राज्यों को बिना भेदभाव किए मुहैया करवाने का आदेश दिया है।

आज एक आम भारतीय अपनी जीवन से तंग है आना-जाना खाना-पीना सैर -सपाटे सभी पर प्रतिबंध है, जैसे कोई गुलाम बन गया हो । पुलिस और स्थानीय प्रशासन का हर तरफ बोलबाला मनमाना चालान निर्दय की तरह किसी पर हाथ छोडना आम बात हो गयी है । आखिर ऐसा कबतक झेल सकते हैं लोग? 2014 में जब भारी बहुमत की सरकार बनी थी तो सबने एक साथ बदलते भारत का सपना देखा था यह इतना बदल जाएगा कि चारो ओर लाश ही लाश बिछ जाएगी  और हमारे राजनेता उन लाशो पर बैठकर राजनीति करेंगे यह कितनी शर्म की बात है।

जब विपक्ष कमजोर और असहाय हो जाय तो प्रायः ऐसा होना स्वाभाविक होता है ।इसलिए विपक्ष को भी मजबूत होना लाजमी है विपक्ष लोकतंत्र की कार्यशैली का मुख्य आधार माना जाता है ।उन्हें लाशों पर राजनीति छोड देश के लिए संविधान पीठ की तरह आगे आकर जन आकांक्षा पर खडे उतरने का प्रयास करना चाहिए। 

भारत विभिन्नता से भरा देश है।यहां के संसाधन का इस्तेमाल भी सभी को सीमित करना चाहिए। जिस तरह वे अपने घरों में सामानों का करते हैं। प्रकृति से छेड़छाड़ और प्रकृति के प्रति उदासीनता ने आज हवा पीठ पर लादने की नौबत ला दी है।शहर का प्रदूषण स्तर बढ़ता ही जा रहा है ।

ठीक उसी तरह आज देश में भ्रष्टाचारी दुराचारी और कालाबाजारियों ने हर ओर लूट मचा रखी है ।जहा जहां भी लाकडाउन है वहां के बडे कारोबारियों ने सामान को जमा कर दोगुने रेट पर बेचकर अपनी अपनी तिजोरी भर रहे हैं ।जहां शराब बिक्री बंद है वहां शराब घर घर पहुँचाया जा रहा।आखिर लाकडाउन में ऐसी व्यवस्था क्यों?क्या भंडारण किए वगैर लाकडाउन लगाया गया ?तो फिर जिम्मेदार कौन? इन्ही सब मसले पर देश की तमाम अदालतों ने मौजूदा सरकारों को आड़े हाथ लेकर एक बार खोयी हुई विश्वास को पुनःसंजीवनी देने का कार्य किया है जिससे न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास और बढेगा। 




                                              आशुतोष 
                                            पटना बिहार 
June 04, 2021

बहती शवें , मानवीय सभ्यता का अमानवीय रूप manviy sabhyta ka amanviya rup (lekhak-ashutosh)

 बहती शवें , मानवीय सभ्यता का अमानवीय रूप 


कोरोना काल ने हमें मानव सभ्यता का वह अमानवीय दृश्य दिखाया है जिसे हमारी सभ्यता क्रूर कहती है।नदियों में बहती लाशें, रेतो में दफन लाशें, जिसका अंतिम संस्कार तक नहीं हुआ आखिर ये लाशें कैसे आयी? और कहाँ से आयी? यह विषय नही हो सकता हां यह जरूर हो सकता है कि यह अमानवीय कृत है । क्या सरकारें आंकडे छिपाने के लिए लाशों को नदी में बहा रही है अथवा हम इतने असमर्थ हो चुके हैं कि अंतिम संस्कार किये वगैर विसर्जित कर रहे।दोनो ही कृत अमानवीय है।


"वो जिनके अपने चले गये
वो जिनके सपने चले गये
इस कालरूपी तांडव ने देखी
अपनो की बहती लाशें "


पिछले दिनों नदियों में सैकड़ो बहती लाशो ने प्रशासन और सरकार दोनो पर सवालिया निशान खडा किया है।आखिर कैसे और क्यूँ इतनी तादाद में लाशें आयी। उन तमाम सरकारों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि बहाने के पूर्व उनका संस्कार हो आखिर यह हिन्दुस्तान है और यहां की आबादी हिन्दु बाहुल्य है ऐसे में यह बहती लाशें उन तमाम हिन्दुओं पर तमाचा है जो सही मायने में राष्ट्रभक्त हैं।


सवाल यह नही कि कौन सी सरकारें ने ऐसा किया सवाल यह है कि ऐसी विकृत तस्वीर देश में देखने को मिली।कारण अनेको हो सकते हैं लेकिन जब सभी प्रकार की टेक्नोलॉजी है फिर किसने बहाया और कैसे बहाया उसकी तस्वीर क्यों नहीं? जब बैठे बैठे हम देश विदेश की तस्वीर खीचने और निगरानी करने का दम भरते हैं तो कैसे मुमकिन है कि लाशें गंगा या और नदियों  में बहे और सरकार को मालूम न हो ।

"निगल रहे शहर- दर- शहर
फैल रहे अब गांव-गांव
कान में हर ओर सुनाई दे
करोना का वेर्दद कहर"



सरकारें अपनी नाकामी छिपाने का लाख प्रयास करे लेकिन सच्चाई कभी छिपती नहीं।हम कोरोना से लड़ने में चूक किए है । इसे सरकारों को स्वीकार करना होगा।आज भूखमरी एक गंभीर स्थिति है। वेरोजगारी चरम पर है, और सरकारें मौज में। आम जन जीवन को न आवश्यक सामान है और न ही प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएँ जिसे जहां मिले सिर्फ लाकडाउन के नाम पर लूट।क्या दूसरे देशों में कोरोना नही हुई वहां तो ऐसी विकृत स्थिति नहीं है।

हमारा सिस्टम पूरी तरह फेल रहा है।हमने कोई तैयारी नही की पिछले साल से कोई सबक नही लिया सरकार के स्तर पर सिर्फ ख्याली पुलाव पकते रहे न ऑक्सीजन , न वेंटिलेटर, न वेड न एम्बुलेंस और न ही दवाईयां आखिर किसकी चूक है  राज्ये केन्द्र को और केन्द्र राज्य को बस इसी पशोपेश में पाच साल चले जाते रहे हैं जिसका नतीजा आज हमारी लाशों को चिल कौए नोच रहें हैं।ऐसी भयावह और विकृत तस्वीर दुनियां ने पहले नही देखी होंगी जो आज इन नदियों में बहती लाशें को देखकर महसूस हो रहा।आमलोग ठगे जा रहे जबकि सरकारें एक दूसरे पर तोहमत लगाती फिर रही है,आखिर क्यूँ? क्या नैतिकता कुछ भी शेष नही बची सरकारो में ? क्या प्रशासनिक कोई जिम्मेदारी नही कि शवो का संस्कार भी करा सके? देश की तमाम आयोगें स्वंय सेवी संस्थाएँ आज कहां सोई हैं ? आखिर यह जिम्मेदारी किसकी है?सरकार आम आवाम की दुख दूर करने के लिए होती है पर यहाँ तो लाशों पर राजनीति हो रही है, जो मानव सभ्यता का एक अभद्र आचरण कहा जाएगा ।
                                             
खामोश हो रही एक एक कर
हर शहर की आबादी 
एक से दहाई से सैकड़ा
अब लाखों में 
मौत के आगोश में आबादी।।



                                         आशुतोष 
                                       पटना बिहार 

May 31, 2021

कोरोना के बढ़ते प्रकोप korona ke badhte prakop

            कोरोना के बढ़ते प्रकोप


कोरोना के बढ़ते प्रकोप से ज़िन्दगी की रफ्तार थम सी गई और लोग अपने घरों की चारदीवारी में कैद हो गए।मेरे घर के निचले हिस्से में रहने वाला परिवार भी इसकी चपेट में आ चुका था सो मेरा डरना स्वाभाविक था।बाहर तो दूर की बात थी मैंने तो नीचे जाना भी छोड़ दिया।घर के दो कमरे में खुद को सीमित कर लिया। टी वी में दिन रात मौत,चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव जैसी खबरें सुन- सुनकर जी घबराने लगा तो सोचा चलो थोड़ा छत पर ही टहल लूं।आसमान में कृष्ण पक्षी चांद अपनी मनोरम छटा बिखेर रहा था। मैं सम्मोहित हो,उसे एकटक देखने लगी।यकायक मुझे लगा कि उसने मुझसे मुस्कुराकर पूछा-"इतनी जल्दी घबरा गईं अकेलेपन से?मुझे देखो मैं तो सदियों से अकेले भटक रहा हूं।चलो कुछ बातें करते हैं।दोनो का कुछ वक्त गुजर जाएगा।" मैंने अपनी आंखें मचली,कहीं यह मेरा वहम तो नहीं।लेकिन यह बिल्कुल सच था।वह सचमुच मुझसे बातें कर रहा था।

चांद: तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया।

  मैं : अरे! तुम अकेले कहां हो? तुम्हारे इर्द गिर्द असंख्य        तारिकाएं भी तो हैं जो तुम्हारे साथ विचरती रहती हैं।मुझे देखो मैं कितनी अकेली हूं।चाहकर भी अपने दोस्तों से नहीं मिल सकती।केवल जरूरी चीजें ही लेने बाहर निकल सकते हैं।पता नहीं कहां से यह मनहूस वायरस आया है,जाने का नाम ही नहीं लेता।जीना दूभर कर दिया है इसने।(एक ही सांस में मैंने अपनी सारी खीझ निकल दी)

चांद(मुस्कुराते हुए): अरे,अरे इतनी नाराजगी ठीक नहीं है।ठंडे दिमाग से सोचो कि आख़िर इसके पीछे का कारण क्या है?एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में तुम लोग प्रकृति से ही खिलवाड़ कर बैठे।और तो और ईश्वर बनना चाहा।तो अब भोगो उसका परिणाम।

मैं : (क्रोधित होते हुए)लेकिन केवल कुछ लोगों की गलती की सजा सबको क्यों मिल रही है?

चांद: वह इसलिए क्योंकि उन कुछ लोगों के ऐसे कार्यों का मौन समर्थन तो आखिर सभी करते हैं।विकास के नाम पर जब जंगल के जंगल उजाड़े जाते हैं,अबोध जीवों के आवास नष्ट करके उनका शिकार किया जाता है,नदियों का बहाव रोककर बांध बनाए जाते हैं,पर्वतों को काटा जाता है,मिट्टी के साथ खिलवाड़ किया जाता है,तब तो सब बहुत खुश होते हो।कभी सोचा भी है घर-आंगन में फुदकने वाली गौरैया और अन्य बहुत से पक्षी आखिर कहां गायब हो गए?तुम जैसे संवेदनहीन लोगों के साथ ऐसा ही होना चाहिए,तभी शायद कुछ हो सके।(विषाद में भरकर)
मैं अवाक रह गई और कुछ बोल न सकी।जवाब देती भी तो क्या?बहस करती भी तो कैसे?चांद ने को कुछ भी कहा वह अक्षरश: सच ही तो था।हम आधुनिकता और प्रथम आने की 
चाह में कब आदमी से दानव बन गए पता ही नहीं चला।चुपचाप भारी कदमों से मैं अपने कमरे में वापस लौट आई।चांद अब भी मुस्कुरा रहा था।

प्रेषक:कल्पना सिंह

पता:आदर्श नगर, बरा, रीवा ( मध्यप्रदेश)

May 31, 2021

विकास पुत्र की लालसा में अबला Vikas putr ki lalsa me abla

                  विकास पुत्र की लालसा 
                                में 
                            अबला 


सन 2005  की वो हसी शाम थी।जिस दिन हमारी शादी कुर्सी से हुई आज सोलह वर्ष हो गये लेकिन विकास पुत्र का जन्म नही हुआ ।महिला, माता, बूढे, बुजुर्ग, की दर्द भरी कहानी जो विकास के खोखले दावो की पोल खोलता गंगा तट पर दफन हो गया । क्या कुर्सी के कुमारों एक भी विकास पुत्र पैदा कर पाएँगे? 

वैसे कुमारों ने अपनी सेहत और अपने उठने बैठने के तौर तरीके में खूब विकास की है। देखा जाय तो ऊँचे ऊँचे बिल्डिंग बनी, व्यापारियो के ऋण माफ किए गये,म्यूजियम, यौवन की उन्नति के लिए जगह जगह रास लीलापार्क, ओवरब्रिज, पुल पुलिया, सडक, पानी, बिजली लेकिन सबसे जरूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पूरे साम्राज्य में ऐसी विखरी कि आज कुमारो को विनास पुरूष का तगमा लिए फिर रहे हैं। ऐसी शादी का क्या जो विगत सत्रह सालो में एक स्वास्थ्य रूपी स्वस्थ पुत्र पैदा नही कर पायी।रोते विलखते लोग परिजन दर दर ठोकर खाएँ और कुमारो भीडिओ फेसबुक और व्हाट एक के जरिए चंद चाटुकार से भोजन का स्वाद पूछकर विकास का वखान चैनल पर करते रहे ।शहर की राजधानी की नामी गिरामी अस्पताल में मरीज के साथ हैवानियत बालात्कार क्या नही ? मुजफ्फरपुर चमकी, चारा, अलकतरा सेल्टर होम,सृजन ऐसे कई कारनामें है जिसे अब सहने की आदत सी पड़ गयी है।

आज लिखते हुए हाथ कांपते है मगर इस दर्द विदारक घड़ी में कलम को ही हथियार बना लिया हूँ क्योंकि मैं एक वेवश अबला नारी हूँ। बिहार मायका है मेरा और इस मायके की यह दुर्दशा देखकर मैं विवश और रो पडी हूँ । ऐसे न जाने कितने अस्पताल है जिसके उद्घाटन तो हुए लेकिन न दवा है न डाक्टर न सफाई है न व्यवस्था सारी बस किताबो के पन्ने में दब गयी और योजनाओं की पैसा तिजोरियों में आखिर यह बंदरबांट का खेल खेलकर कैसे विकास पुत्र पैदा करेगे।

अब महीने दिन बाद बिहार पुनःबाढ की विभीषिका झेलेगा और उजड़ जाएगी कितने विकास पुत्र, मां के कोख में ही कोशी, कमला, गंडक, गंगा की लहरों में दम तोड़ देंगी। यह सिलसिला आज से नही सदियों से चली आ रही है।प्रत्येक साल दावे होते है लेकिन लाखो की तादाद में लोग प्रभावित होते है।फिर मुआवजे और रिलीफ फंड का ढिंढोरा पीटकर घडल्ले से तिजोरी भरे जाते हैं और विकास पुत्र को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है।

विकास पुत्र पैदा करने के सपने तो हर अबला नारी को दिखाया जाता है लेकिन ऐसी सरकारें या सिस्टम नहीं बना जो विकास पुत्र ही पैदा करे।हां घोटाले पुत्र की फौज खडी है जब घोटाला पुत्र की तादाद बढ़ जाय तो कोई विकासपुत्र की उम्मीद कैसे रखे पक्ष हो या विपक्ष सभी घोटाले में दबे होते है और उसमें दबती है मां की आशाएं बहन का सुहाग और फिर रोज मरता है विकास पुत्र ।

                                           आशुतोष 
                                          पटना बिहार 
April 24, 2021

सकल घरेलू उत्पाद का 8% स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाना चाहिए Sakal gharelu uatpad

 सकल घरेलू उत्पाद का 8% स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाना चाहिए।


भारत दुनिया के मुकाबले स्वास्थ्य सेवाओं पर सबसे कम खर्च करती है हमारे यहां जीडीपी का मात्र 1•२% ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाता है।वक्त आ गया है कि अब इसमें अच्छी खासी बढोतरी की जाय। राष्ट्रीय स्वास्थ्य  नीति ने तो राज्य सरकारो को 8-10% तक बजट में खर्च करने की बात कही है।जो औसतन 4-5% ही खर्च कर पाते हैं।

आज स्वास्थ्य सेवाओं का चरमराना आम लोगो पर भारी पड़ रहा है। वेड, वेंटिलेटर,आईसीयू, दवाएँ और ऑक्सीजन जैसी जरूरी सामान की किल्लत ने न जाने कितने  ही परिवारों को निगल चुकी है ।अच्छी स्वास्थ्य सेवा का होना अनिवार्य है जो कि सरकारें ही सुनिश्चित कर सकती है और सरकारो को भी जात-पात, आरक्षण से परे हटकर दायरा बढाना होगा ।आज चारो तरफ किल्लत ही किल्लत है आखिर क्यूँ? क्या बजट के प्रावधानों में स्वास्थ्य की अहमियत नही रही?क्या सरकारे सिर्फ जात पात और सब्सिडी बांटने परअपना ध्यान और क्षमता को केन्द्रित करती रहेंगी आखिर कबतक?

देश की स्वास्थ्य और उनसे जुड़े हुए सारी सेवा को चाकचौबंध करना ही होगा और बजट के दायरे को बढाये वगैर ऐसा संभव नहीं है।इस महामारी काल ने हमारे सफेद पोश की सफेद झूठ का पोल इस तरह खोला है कि चारो ओर चीख पुकार सुनने को मिल रही है क्या यही अच्छे दिन की परिभाषा है या फिर सरकारों की मनमौजी ।आखिर राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की बातों को अनदेखी क्यों हो रही है।जब हम स्वस्थ्य ही नही रहेंगे तो एक रूपये गेहूँ और एक रूपये चावल बांटने की नीति का क्या करेंगे?

वैसे देखा जाय तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में अमूल्य परिवर्तन हुए हैं लेकिन यह सिर्फ चंद शहरो तक सीमित हैं जबकि ग्रामीण स्तर पर या फिर जिला स्तर पर यह परिवर्तन होनी चाहिए जो सिर्फ और सिर्फ बातो से नही अपितु जमीनी स्तर पर करना ही होगा वैसी कार्य प्रणाली और सेवा प्रणाली को सुदृढ करना होगा जो स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यो को जिम्मेदारीपूर्वक करें सभी सरकारों को स्वास्थ्य के लिए  पहली प्राथमिकता के साथ तवज्जो देनी होगी और समस्याओ के निदान कर्मठ व योग्य चिकित्सको को लाना होगा।यह सभी कार्यो को तभी अमलीजामा पहनाया जा सकता है जब बजट हो और उसका इस्तेमाल सही तरीके से हो तो कुछ भी संभव है ।

हम आबादी के हिसाब से भी देखे तो एक वेहतर स्वास्थ्य लाभ के लिए 2500 से 5000 की आबादी पर एक डाक्टर और एक नर्स का होना अनिवार्य माना जाएगा।लेकिन जब हम ऑकडो पर आते है तो ग्रामीण क्षेत्रो में यह 50,000और शहरी क्षेत्रों में 25,000 पर पहुँच जाता है ऐसे में एक अच्छी स्वास्थ्य सेवा का सपना देखना लोगो पर भारी पड़ रहा है और सरकारें विकास का वखान करती नजर आ रही हैं जबकि हकीकत सबके सामने है।

 संविधान के 74वें संशोधन कहता है कि नगर निगम और नगरपालिका जैसे स्थानीय शहरी निकायों का कर्तव्य है कि वे शहरी क्षेत्र में प्राथमिक और व सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करावें।स्वास्थ्य के लिए हर किसी की प्राथमिकता देनी होगी चाहे वह पंचायत प्रतिनिधि हो विधायक हो सांसद अथवा मंत्री।

आज यह महामारी हमारी सिस्टम और प्रचारित कार्यप्रणाली की कलई खोल रही है और सभी मूकदर्शक बने हुए है जबकि जिन्दगी दम तोड़ने पर विवश है।कोई वेड खोज रहा, कोई ऑक्सीजन, तो कोई डाक्टर, कोई अस्पताल,कोई एम्बुलेंस, कोई श्मशान, ऐसा हिन्दुस्तान विवश और लाचार कभी नही दिखा इस महामारी ने सबको लाचार बना डाला है चाहे वह सरकारें हो या आम जनता।


                                          आशुतोष 
                                         पटना बिहार 
April 22, 2021

निगरानी तंत्र को मजबूत करने की जरूरत Tantra ko majabut karne ki jarurat

 निगरानी तंत्र को मजबूत करने की जरूरत


एक तो महामारी और उपर से निगरानी तंत्र की गैर जिम्मेदाराना रवैया सिस्टम पर ही सवालिया निशान छोड़ रहा है।यह बात मैं नही यह आंकड़े कह रहे हैं।चारो तरफ हाहाकार है ऐसे में बडी मात्रा में टीका का बर्बाद होना सवालिया निशान खड़ा करता है।अब तक देश में लगभग 44-45 लाख  से अधिक टीका की खुराकें बरबाद हो चुकी है।वो भी उस समय जब देश के अधिकांश हिस्से आज महामारी से त्रस्त हैं। देश की स्वास्थ्य सेवा की बदइंतजामी का यह जीता जागता उदाहरण है । इसमें ऐसे राज्य सबसे उपर है जहां यह बीमारी जोरों पर है बिहार, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडू, हरियाणा, महाराष्ट्र,गुजरात और राजस्थान । भारत दुनिया में आबादी के लिहाज से दूसरे स्थान पर है, ऐसे में किसी तरह की दवा की बर्बादी आबादी पर भारी पड़ सकता है ।यह बात स्वास्थ्य कर्मियों एवं वितरण प्रणाली को समझना होगा।आज भारत में प्रत्येक दिन  लगभग 2000 लोग दम तोड़ रहे है और 2 लाख प्रतिदिन नये संक्रमित मिल रहे हैं। श्मशान में लंबी कतारें लग रही है और स्वास्थ्य विभाग की बदइंतजामी से दवा बर्बाद हो रहे है आखिर जब प्रोटोकाल तय किया गया तो उसका अनुपालन क्यों नही हुआ ? 

राज्य और केन्द्र के बीच सम्बन्ध अच्छे न होना एक अलग और संघीय ढांचे का हिस्सा हो सकता है लेकिन कुछ मसले महामारी के वक्त यह बद इंतजामी उन सरकारो पर सवालिया निशान जरूर छोड गये हैं जो लाशों पर अपनी राजनीति की रोटी सेक रहे हैं।

आज अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने 15-20 प्रतिशत लोगों को टीकाकरण कर चुका है जबकि भारत अभी तक 1 प्रतिशत के दायरे में सिमटकर अपनी टीका की बर्बादी गाथा लिख रहा है।

हम ऐसी जगह आ पहुँचे है जहां कोताही की तनिक भी गुंजाइश नहीं है हमारी मृत्युदर बढ़ रही चारो ओर हाहाकार है, ऐसे में तमाम राज्यों के स्वास्थ्य सेवाएं और निगरानी तंत्र को वेहद मुस्तैदी से काम करना ही होगा क्योंकि यह मानवता की पुकार है ।इस समय वेहद सर्तकता से जीवन बचाने के लिए सामने आए चुनौतीयों से लड़ना होगा।

जीवन रक्षक दवाओं एम्बुलेंस सेवाओं और जरूरी खाद्य सामग्री का सुचारू रूप से उपलब्धता बढ़ानी होगी ।लोकतंत्र में विश्वास रखकर जात पात से परे हटकर मानवता के लिए  सभी आगे आएं और जीवन की रक्षा करें ऐसे संकल्प बनाने होंगे।डरना नही,हमें तो लड़ना है, एक तंत्र से, दूजा कोरोना से, यही विवशता है, और समय की मांग भी?




                                          आशुतोष
                                        पटना बिहार
April 20, 2021

हवा में भी वायरस की मौजूदगी वेहद चिंताजनक Hawa me bhi vaayaras maujud h

हवा में भी वायरस की मौजूदगी वेहद चिंताजनक

 अब तक हम सभी यही सोच रहे थे कि वायरस सिर्फ छूने या संपर्क में आने पर फैलता है लेकिन आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ की टीम ने अपने शोध में कोरोना के हवाई संक्रमण की साक्ष्यों  की पहचान की है। उनका यह मानना है कि इतना बड़ा संक्रमण हवा के जरिए ही हो सकता है। वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि दुनिया में 30-40 प्रतिशत संक्रमण ऐसे फैले है जहां न खांसी थी और न ही जुकाम था।


वैज्ञानिको के  शोध को अगर सही माना जाय तो आने वाला समय और भी भयावह और विकृत हो  सकता है।हवा का वायरसयुक्त होना मानव प्रजाति पर गहरे संकट की ओर इशारा करती है।ऐसे विकल्प की तालाश करनी होगी जो हवा में फैल रहे इस वायरस का खात्मा कर सके लेकिन अफसोस इसे मारने या रोकथाम के लिए कोई मेडिसीन अथवा कारगर उपाय नही हो सका है।


वैसे दुनियाभर के वैज्ञानिक इस वायरस की खात्मा के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं ऐसी आशा की जानी चाहिए कि जल्द ही कुछ न कुछ चमत्कार हो सकता है । मानव के उपर इस गहरे संकट से उबारने के लिए हमारा विज्ञान अभी विवश जरूर है लेकिन यह एक अवधि है संपूर्ण विज्ञान नहीं।इतिहास को देखा जाय तो अनेको बार मानव जाति पर आये संकट को उबारने में विज्ञान ने एक महत्वपूर्ण योगदान देकर उबारा है आने वाले समय में भी यही होगा। लेकिन तब-तक अपने आप को बचाना एक चुनौती है जिसे स्वंय को हिफाजत में रखकर मुकाबला हर किसी को करना होगा।


अब यह भी जरूरी हो गया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य स्वास्थ्य एजेंसियां संक्रमण के विवरण को विज्ञान के अनुरूप कर वायु में फैलने से रोकने के उपाय के बारे में ध्यान दें।सरकार के स्तर पर भी इन उपाय पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए। संक्रमण को हर हाल में रोकना होगा।


दुनिया जानती है कि वायरस आखिर चीन से ही फैला है लेकिन चीन में सबकुछ सामान्य हो जाना और दुनियाभर में फैलजाना एक गहरी अंतर्राष्ट्रीय साजिश की तरफ इशारा करती है जिससे कतई इन्कार नही किया जा सकता।वैसे भी दुनिया में भारत एक उभरती हुई  शक्ति है जो स्वंय ही हर आने वाले तूफान से टकराने की हुनर जानता है।आये दिन वोर्डर पर चीन व पाक की कुटील नीतियों को हमने बडे साहस और पराक्रम से ध्वस्त किया है। यदि यह वायरस में भी किसी तरह की साजिश है तो इसका फल उक्त देश अवश्य ही भुगतेगा ।


इस बात से भी इन्कार नही किया जा सकता कि आखिर इसका फैलाव दुनिया में इस वर्ष कम है। अपेक्षाकृत भारत के, ऐसा क्यूँ ? क्या भारत दुनिया की निगाहो में खटकने लगा है या भारत को कोई विकसित नही होने देना चाहता ?



                                                आशुतोष

                                             पटना बिहा