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January 24, 2022

nagarjun ka jivan prichay नागार्जुन की जीवनी

  नागार्जुन की जीवनी / naagarjun  ki jivani / नागार्जुन का जीवन परिचय / nagarjun ka sahityik jivan prichay / बाबा नागा अर्जुन / वैधनाथ मिश्र / यात्री/ jankavi  / जन कवि/जनता के कवि / janta ke kavi / नागार्जुन के संस्मरण / राजनीति दृष्टि से कन्फ्यूजन कवि /Baba Nagaarjun ka prichay / Adhunik Kabir/ आधुनिक कबीर/ nagarjun ka jam kaha hua tha/ नागार्जुन का मूल नाम/ nagarjun ki rachnaye / नागार्जुन का कविता-संग्रह/ nagarjun ka kavy / नागार्जुन की प्रमुख रचनाएँ / nagarjun ka upnyaas / नागार्जुन का कहानी संग्रह/ nagaarjun ki kahaniya/ नागार्जुन का प्रबंध काव्य / nagaarjun ki maithili rachnaye / नागार्जुन की मैथिली रचनाएँ / नागार्जुन का उपन्यास/ नागार्जुन का  मैथिली काव्य





नागार्जुन की जीवनी

नागार्जुन का जन्म सन् 1911 में बिहार के दरभंगा जिले के तरौनी  नाम के  छोटे से गांव में  हुआ थ।   नागार्जुन का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था, लेकिन हिन्दी साहित्यिक में नागार्जुन के नाम से मशहूर हो गएनागार्जुन जब तीन साल के थे तो उनकी मां का देहान्त हो गया था. नागार्जुन का विवाह अपराजिता देवी के साथ हुआ और उनके पांच बच्चे हुए

 

नागार्जुन हिंदी साहित्य के एक प्रसिद्ध लेखक थे। वह अपने समकालीन लेखकों व प्रशंसको के द्वारा प्यार से नागार्जुन, ‘जनकवी आधुनिक कबीर, यात्री आदि कवि कहे जाते थे। नागार्जुन की कविताओं में मुख्य रूप से राजनीति, आम लोगों की समस्याएं, किसानों और श्रमजीवी वर्ग की समस्याओं का उल्लेख किया गया है। नागार्जुन संस्कृत, प्रकृत और पाली जैसे प्राचीन भारतीय भाषाओं के ज्ञाता थे। संस्कृत के ग्रंथों और दार्शनिक व्याख्यानों और बौद्ध धर्मग्रंथों के अध्ययन के लिए ये श्रीलंका चले गये जहाँ जाकर उन्होंने केलानी के मठ में बौद्ध धर्म को अपनाया लिया।

 

नागार्जुन मार्क्स, लेनिन और स्टालिन के लेखन से बहुत प्रभावित थे  नागार्जुन ने  किसानों के सशस्त्र विद्रोह का समर्थन किया और बाद में जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में सरकार विरोधी आंदोलन में पूरी तरह शामिल हो गये थे। इस दौरान उन्हें ग्यारह महीने के लिए जेल भी जाना पड़ा था। सन् 1983 में उनके साहित्यिक योगदान के लिए  नागार्जुन को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मैथिली में रचित पत्राहीर नगना गाचिन संग्रह को सन् 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और सन् 1998 में नागार्जुन का देहांत हो गया।

 
 

नागार्जुन की प्रमुख रचनाएँ / Nagaarjun ki rachanaaye

नागार्जुन का कविता-संग्रह/ nagaarjun ka kavitayen
  1. युगधारा-1953
  2. सतरंगे पंखों वाली -1959
  3. प्यासी पथराई आँखें -1962
  4. तालाब की मछलियाँ-1974
  5. तुमने कहा था -1980
  6. खिचड़ी विप्लव देखा हमने -1980
  7. हजार-हजार बाँहों वाली -1981
  8. पुरानी जूतियों का कोरस
  9. रत्नगर्भ -1984
  10. ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या -1985
  11. आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने -1986
  12. इस गुब्बारे की छाया में -1990
  13. भूल जाओ पुराने सपने -1994
  14. अपने खेत में -1997


गगार्जुन का प्रबंध काव्य-

  1. भस्मांकुर -1970
  2. भूमिजा
 
 
नागार्जुन का उपन्यास/ Nagarjun ke upnyaas
  • रतिनाथ की चाची -1948
  • बलचनमा -1952
  • नयी पौध -1953
  • बाबा बटेसरनाथ -1954
  • वरुण के बेटे -1956
  • दुखमोचन -1956
  • कुम्भीपाक (चम्पा)-1960
  • हीरक जयन्ती (अभिनन्दन)-1962
  • उग्रतारा -1963
  • जमनिया का बाबा ( 'इमरतिया)-1936
  • गरीबदास -1990


नागार्जुन के संस्मरण-

  • एक व्यक्ति: एक युग -1963


नागार्जुन का कहानी संग्रह-nagarjun ki kahaniya

आसमान में चन्दा तैरे -1982



नागार्जुन की मैथिली रचनाएँ / nagarjun ki maithili rachnaye

  • चित्रा (कविता-संग्रह) -1941
  • पत्रहीन नग्न गाछ -1967
  • पका है यह कटहल -1995
  • पारो (उपन्यास)-1946
  • नवतुरिया -1952




January 22, 2022

कबीरदास और उनके जन्म की कथा kabirdas ki rahasyamay kahani

 कबीरदास / Kabirdas

 कबीरदास और उनके जन्म की कथा/Kabirdas ke janam ki katha

कबीरदास के जन्म की कहानी बड़ी ही चमत्कारपूर्ण एव रहस्यमयी है कबीरदास जी के जन्म के बारे में कई विद्वा का अलग-अलग मत देते हैं, लेकिन कबीरदास के जन्म के बारे में कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं है ज्यादातर विद्वानों का मानना है कि, कबीर दास जी का जन्म 14वी शताब्दी के अंत (सन 1398) में वाराणासी, उत्तरप्रदेश में हुआ था 
 
 

जन्म से जुड़ी रहस्यमयी कहानी /kabirdas ki rahasyamay kahani

एक समय की बात है की एक मुस्लिम परिवार नीरू और नीमा जिसका कोई संतान नहीं था। सन्तान प्राप्ति के लिए दोनों रोजाना अल्लाह/भगवान से संतान की प्रार्थना करते थे एक भगवान ने दोनों की प्राथना सुन ली। एक  दिन  में नीरू  और नीमा कहीं जा रहे थे तो रास्ते मे एक बच्चे की रोने की आवाज सुनाई दी।  दोनो  वहां पहुचे तो  देखा तालाब  किनारे एक  बच्चा है।  वे दोनों  बच्चे के  पास  गए तो बच्चा  हंसने लगा और हाथ  पैर  झटपट आने  लगा मानो जैसे कह रहा हो मुझे अपनी शरण में ले लो नीरू और नीमा जिनका कोई संतान नही था। उन्होंने उस बच्चे को अपना  लिया  और  उसे  तालाब  से  उठाकर  घर  ले  आए।  नीरू  नीमा  ने  सोच  की  यह  भगवान / अल्लाह  का दिया  हुआ  वरदान है।  उनकी  रोजाना  की  भक्ति  सफल  हुई  और  ईश्वर ने ये  बच्चा  उनको  खुश  होकर  दिया है।  वह  उस  बच्चे  का  अच्छी  तरफ  से लालन  पालन  करते हैं।
 
 
अतः इस तरह एक मुस्लिम परिवार ने कबीरदास जी का पालन पोषण किया नीरू और नीमा ने अपना पैतृक पेशा सूत काटना और कपड़े बनाना कबीरदास को सिखाया कबीरदास जी बचपन से ही अध्यात्मिक होते हैं. स्वामी रामानंद जी को उन्होंने अपना अध्यात्मिक गुरु बनाया था. बचपन से ही उनके मन में ईश्वर को जानने की प्रबल इच्छा होती है
 
 

कबीरदास के वास्तविक जन्म की कहानी / Kabirdas ka janam

कबीरदास के जन्म से सम्बंधित एक अन्य कहानी भी है।   कहा  जाता  है  कि  एक  विधवा  ब्राह्मणी  ने एक  बच्चे को  जन्म  दिया  और  लोक - लाज  के  भय  से उस  बच्चे  को तालाब  किनारे  फेक  दिया।  जिससे  उसके  चरित्र  पर  कोई  आँच ना  आये।  उसी  समय  एक  मुस्लिम  परिवार  वहाँ  से  जा  रहा  था।  उस  मुस्लिम  परिवार  ने बच्चे की  रोने की  आवाज  सुनी  और  वहां  गए।  उस बच्चे को रोता देख गोद मे उठा लिया। उस दम्पत्ति की अपनी कोई औलाद नहीं थी।  इसलिए  उस  बच्चे  को  अपने  घर  ले  गये  और  उसका  लालन  पालन  किया।  उस  मुस्लिम  परिवार का  नाम  नीरू  और  नीमा  था।  इन्होंने  ने  कबीरदास  का पालन - पोषण  किया।
 
 

कबीरदास की  मृत्यु की कथा/kabir ki mrityu ki katha

जितना रहस्यमयी और चमत्कारपूर्ण जन्म की कथा है।  ठीक उसी  तफह  कबीरदास की मृत्यु  की कथा  भी है।  कबीरदास  सांसारिक दिखावे  और आडम्बर  के विरोधी  थे और  वो  किसी  भी  प्रकार  के  धार्मिक  पूजा  पाठ  में  विश्वास  नहीं  करते  थे।   कबीरदास  सिंर्फ  निर्गुण  निराकार परमब्रह्म  को मानते  थे और  उनकी ही  पूजा करते  थे।  कहा  जाता है  कि काशी / वाराणासी  में  मरने  वालो  को  स्वर्ग  मिलता  है  और  मगहर  (उत्तरप्रदेश )  में मरने पर  नर्क मिलता  है  सदियों  पहले  भी अंधविश्वास  था  और  आज भी  अंधविश्वास लोगो मे  भरा पड़ा है।  जब यह  बात कबीरदास जी  ने  सुनी  तो उन्होंने  कहा ये नर्क  स्वर्ग कुछ नही होता है
 
 
लोगो का  अंधविश्वास दूर करने के लिए  कबीरदास ने  निश्चय  किया की  वे  अपने  जीवन के अंतिम दिन  मगहर में बिताएंगे।  कबीरदास अपने जीवन  के अंतिम  दिनों में मगहर  में ही रहे  और  वहीं कबीरदास  जी की मृत्यु  हो गयी।  कबीरदास  की  मृत्यु  के  बाद  हिंदू  संप्रदाय और  मुस्लिम संप्रदाय  में काफी  विवाद हुआ था, क्योंकि दोनों  संप्रदाय कबीरदास  को  अपना  मानता  था। हिंदू संप्रदाय  अपने मुताबिक  कबीर दास जी का  अंतिम संस्कार  करना  चाहते थे  और  मुस्लिम  संप्रदाय  अपने  मुताबिक  अंतिम  संस्कार  करना  चाहते थे। 
 
 
 दोनो के  धार्मिक  विवाह में ऐसा  चमत्कार हुआ  कि  किसी अंतिम  संस्कार के  लिए  कबीरदास जी  का शव  नसीब  ही नहीं  हुआ।   जब  कबीरदास के  शव से कफन  को  हटाया गया  तो कबीरदास  मृत शरीर  की जगह  कुछ  फूल  पड़े  मिले हैं  हिंदी  मुस्लिम  दोनों  हैरान रह जाते हैं,   यह क्या हुआ?   कैसे हुआ?  उसके  बाद दोनों  ही  संप्रदाय के  लोग फूलों  का आधा - आधा हिस्सा  करके  अपने  धर्म के  अनुसार  अंतिम  संस्कार  कर  देते  हैं