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February 01, 2022

मुहब्बत का खुला पैगाम गाँधी / हमीद कानपुरी mahatma gandhi

 

मुहब्बत  का  खुला पैगाम गाँधी

नया  एंगिल  नया आयाम  गाँधी।
हमारे  मुल्क को  इन्आम  गाँधी।

बुराई   से    रहे   लड़ते    हमेशा,
मुहब्बत का  खुला पैगाम  गाँधी।

भुलासकता नहीं सदियों ज़माना,
जहां में कर  गये वो काम  गाँधी।

अहिंसालफ़्ज़ जबआया कहींतो,
ज़बां पर आ गया है नाम  गाँधी।

किसी से तुम  करो बर्ताव  कैसा,
सिखाते थे  हमें  हर गाम  गाँधी।

कहीं कुछ ठानकर आगे बढ़ेजब,
नहीं हरगिज़  रहे  नाकाम गाँधी।

हमीद कानपुरी,
अब्दुल हमीद इदरीसी,
179, मीरपुर , कैण्ट, कानपुर- 208004
9795772415

January 25, 2022

चुनावी सियासत/ Chunavi Siyasat/हमीद कानपुरी

 ग़ज़ल/ghazal/चुनावी सियासत/Chunavi Siyasat


ज़ह्र आलूदा  चुनावी   कुल  सियासत  देखकर।
हौसला होता  नहीं  लड़ने  का नफरत  देखकर।

पहले मिसरे की नज़ाकत औ लताफ़त देखकर।
खुश हुई महफ़िल बला की ये ज़हानत देखकर।

मंज़िलों  की   सिम्त  बढ़ते  जा रहे  मेरे  क़दम,
कुल जहां  हैरत   ज़दा  मेरी  हरारत   देखकर।

साफ़ सुथरी  दूर तक दिखती नहीं है अब कहीं,
शर्म आती आजकल की बदसियासत देखकर।

ग़लतियाँ उससे  हुईं  हैं  अनगिनत इस  दौर में,
कुछ नहीं कहताकोई लेकिन शराफ़त देखकर।

हमीद कानपुरी,
अब्दुल हमीद इदरीसी,
179, मीरपुर, छावनी, कानपुर-208004
January 25, 2022

मुफ़लिसों को दुनिया मे क्या कोई अधिकार नही

 ग़ज़ल/Ghazal


मुफ़लिसों को दुनिया में क्या कोई अधिकार नही
पास है हिम्मत की ताकत समझो तुम लाचार नही।।

लोग गरीबी की अक्सर  खूब खिल्ली  उड़ाते हैं 
इंसान नही हैं ऐसों पर बोलो क्यों धिक्कार नहीं ।।

चारो तरफ घना अँधेरा नही रोशनी की गुंजाइश 
हर  हाथों  में नफ़रत है  प्यार कहीं दरकार नहीं ।। 

जीवन में संघर्ष बहुत जिनसे लड़ना - मरना है
जीत गए तो जीत है अपनी हार गए तो हार नही।।

बैठे हैं बिकने की खातिर दुनियां के बाजारों में
लेकिन ईमां  न बेचूंगा कहीं किसी बाजार नही।।

-आकिब जावेद 
बाँदा,उत्तर प्रदेश
पिन-210203
सम्पर्क- बाँदा,उत्तर प्रदेश
January 24, 2022

राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष (24 जनवरी) / बेटियाँ

राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष (24 जनवरी) 


शीर्षक- बेटियाँ


बंद करो अब बोझ समझना, 
मैं हर मोर्चा डटकर लड़ती हूँ, 
बेटा कहना बंद करो,मुझे अब 
मैं बेटी सुन सम्मानित होती हूँ,  

कभी जिस्म पर कभी वस्त्र पर
करते छींटाकशी,प्रयास रोकने का, 
जब भी मौका मैं पाती हूँ
भरती उड़ान फिर अंबर तक, 

गर्भ में अब भी मरती हूँ
ट्रैकों पर पडी़ भी मिलती हूँ, 
अपना सम्मान बचाने को
वस्त्रों की गठरी बन घर से निकलती हूँ, 

मैं दूर-दराज के गांवों में
बिन संसाधन भाग्य से लड़ती हूँ, 
मैं सफल रहूँ या होउं विफल
पर आक्रमण से नहीं ड़रती हूँ, 

मान तुम्हारा बढ़ा रहीं हूँ
पदक देश को दिला रहीं हूँ, 
हारी नहीं हूँ इंतेहानों से
नए मानक मैं रचा रहीं हूँ, 

अंजू 'लखनवी'
असिस्टेंट प्रोफेसर समाजशास्त्र
श्री महेश प्रसाद डिग्री कालेज ,लखनऊ
January 17, 2022

कविता बालक kavita balak आकिब जावेद

 Balak / बालक

अपनी धुन में मस्त

कल्पनाओं से भरा

किताबो से 

कुट्टी किए

अक्षर नही 

समझता

चीज़ों की 

समझ लिए

आँखों में 

चमक  भरे 

नितदिन विद्यालय आना

फिर शिक्षक से यूं

आकर हाथ मिलाना

अनगिनत प्रकार से

कितने प्रश्न दे जाता है?

काँटो में 

गुलाब खिलेगा

क्या वो अपने 

रंग भरेगा?

मासूम मुस्कान की कीमत

शायद इस लोक में तो नही

शायद किसी भी 

लोक में नही।।


-आकिब जावेद

January 16, 2022

Nizam fatehpur ke ghazal निज़ाम फतेहपुरी के ग़ज़ल

 ग़ज़ल

ग़ज़ल- 1212  212  122  1212  212  122

अरकान- मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन

वतन का खाकर जवाँ हुए हैं वतन की खातिर कटेगी गर्दन। 
है कर्ज हम पर वतन का जितना अदा करेंगे लुटा के जाँ तन।।

हर एक क़तरा निचोड़ डालो  बदल दो रंगत वतन की यारो।
जहाँ  गिरेगा   लहू   हमारा   वहीं   उगेगा   हसीन  गुलशन।।

सभी ने हम पर किए हैं हमले किसी ने खुलकर किसी ने मिलकर।
खिला है जब-जब चमन हमारा हुए हैं इसके हजारो दुश्मन।।

दिखाएं किसको ये ज़ख्म दिल के खड़े हैं क़ातिल बदल के चेहरे।
जिन्होंने लूटा था  आबरू  को  वही  बने  हैं अज़ीज़े दुल्हन।।

हमारा बाज़ू कटा जो  तन  से  वो  तेग़  लेकर हमी पे झपटा।
समझ न आया 'निज़ाम' हमको अजब हक़ीकत हुई है रौशन।।

निज़ाम-फतेहपुरी
ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर
ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत
मोबाइल नंबर- 6394332921  9198120525

January 01, 2022

निज़ाम-फतेहपुरी के ग़ज़ल /Nizam fatehpuri ke ghazal

 ग़ज़ल- बहरे कामिल मुसम्मन सालिम

अरकान- मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
वज़्न- 11212  11212  11212  11212

वो बचा रहा है गिरा के जो, वो अज़ीज़ है या रक़ीब है।
न समझ सका उसे आज तक, कि वो कौन है जो अजीब है।।

मेरी ज़िंदगी का जो हाल है, वो कमाल मेरा अमाल है।
जो किया उसी का सिला है सब, मैंने ख़ुद लिखा ये नसीब है।।

जिसे ढूँढता रहा उम्र भर, रहा साथ-साथ दिखा न पर।
मेरा साथ उसका अजीब है, न वो दूर है न क़रीब है।।

जहाँ दिल में प्यार बसा हुआ, वहीं जन्म शायरी का हुआ।
जो क़लम से आग उगल रहा, वो नजीब है न अदीब है।।

भरी नफ़रतें जहाँ दिल में हों, वहाँ दिल सुकूँ कहाँ पाएगा।
जो फ़िज़ा में ज़हर मिला रहा, वो मुहिब नही है मुहीब है।।

वो डरे ज़माने के ख़ौफ़ से, जिसे मौत पर है यक़ीं नहीं।
मैं डरूँ किसी से जहाँ में क्यूँ, मेरे साथ मेरा हबीब है।।

यहाँ आया जो उसे जाना है, यही ला-फ़ना वो निज़ाम है।
है करम ख़ुदा का उसी पे सब, जो अमीर है न ग़रीब है।।

निज़ाम-फतेहपुरी
ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर
ज़िला- फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत
मोबाइल नंबर- 6394332921
January 01, 2022

नववर्ष पर ग़ज़ल कवि आकिब जावेद New year kavita

  नववर्ष /new year

वर्ष और घर-द्वार बदलते देखें हैं
जां से प्यारे  यार  बदलते  देखें हैं।

देखा है दिल पे कुछ होठों पे कुछ
पल-पल किरदार बदलते देखें हैं।

नफ़रत देखी,देखा हमने  प्यार
चेहरे सौ-सौ बार बदलते देखें हैं।

हर बार उसे अपना समझा जाना
लेकिन बारम्बार बदलते देखें हैं।

मुझे तोड़कर  वो खुद कितना रोया
उल्फ़त के बीमार बदलते देखें हैं।

✍️आकिब जावेद
बाँदा,उत्तर प्रदेश
December 15, 2021

sherashah Banda jila कविता- अपना बाँदा

 कविता - अपना बाँदा

धरती  ऋषि  बाम  देव की,
केन   नदी   का   है  घाट!
यमुना  भी  बहती   यहाँ,
है नवाब  टैंक का ठाट !

दुर्ग अजेय कालिंजर का,
ब्लॉक  है  जिसमे  आठ!

पंच  तहसीलों से जो घिरा,
बुंदेलखंड का है ये भाग!
सात  सौ  इकसठ  गाँव,
खेत - खिलहान और बाग!
शांति- सौहार्द मुहब्ब्त यहाँ ,
कौमी तरानों की बहे राग!

महान साहित्यकारों की तपोभूमि,
पद्माकर,केदारनाथ,नरेंद्र नाम!
विश्व प्रसिद्ध पत्थर यहाँ,
होता शजर का काम !
काली कपास की मिट्टी भी,
आती खेती के बहुत काम!

हिंदी, बुंदेली बोली यहाँ पे,
यहाँ की बात कभी न काट।

बाम्बेश्वर-महेश्वरी मंदिर,
है भूरागढ़ में किला!
जामा मस्जिद विशाल सी
यहाँ सबका दिल मिला!
जहाँ शेर शाह शूरी दफ़न,
है वो ये बाँदा जिला!

-आकिब जावेद
बाँदा,उत्तर प्रदेश
December 13, 2021

एक राजा की कहानी/ek raja or chor ki kahani

               रंगीन चश्मा  (राजा और चोर की कहानी)

                Raja or chor ki kahani

एक समय की बात है बहुत प्रभावशाली, बुद्धि और वैभव से संपन्न राजा था। आस-पास के राजा भी समय-समय पर उससे परामर्श लिया करते थे। एक दिन राजा अपनी शैया पर लेेटे-लेटे सोचने लगा, मैं कितना भाग्यशाली हूँ। कितना अच्छा है मेरा परिवार, कितना समृद्ध है मेरा अंत:पुर, कितनी मजबूत है मेरी सेना, कितना बड़ा है मेरा राजकोष। ओह! मेरे खजाने के सामने कुबेर के खजाने की क्या बिसात? मेरे राजनिवास की शोभा को देखकर अप्सराएं भी ईर्ष्या करती होंगी। मेरा हर वचन आदेश होता है। राजा कवि हृदय था और संस्कृृत का विद्वान भी था। 


                अपने भावों को उसने शब्दों में पिरोना शुरू किया। तीन चरण बन गए, चौथी लाइन पूरी नहीं हो रही थी। जब तक पूरा श्लोक नहीं बन जाता, तब तक कोई भी रचनाकार उसे बार-बार दोहराता है। राजा भी अपनी वे तीन लाइनें बार-बार गुनगुना रहा था।

         लेकिन बार-बार गुनगुनाने पर भी चौथा-चरण बन नहीं रहा था। संयोग की बात है कि उसी रात एक चोर राजमहल में चोरी करने के लिए आया था। मौका पाकर वह राजा के शयनकक्ष में घुस गया और पलंग के नीचे दुबक कर कर बैठ गया। चोर भी संस्कृत भाषा का विज्ञ और आशु कवि था। समस्यापूर्ति का उसे अभ्यास था। राजा द्वारा गुनगुनाए जाते श्लोक के तीन चरण चोर ने सुन लिए। राजा के दिमाग में चौथी लाइन नहीं बन रही है, यह भी वह जान गया लेकिन तीन लाइनें सुन कर उस चोर का कवि मन भी उसे पूरा करने के लिए मचलने लगा। वह भूल गया कि वह चोर है और राजा के कक्ष में चोरी करने घुसा है। अगली बार राजा ने जैसे ही वे तीन लाइनें पूरी कीं , चोर के मुंह से चौथी लाइन निकल पड़ी , 

*सम्मीलने नयनयोर्नहि किंचिदस्ति॥* 

       .      राज्य, वैभव आदि सब तभी तक है, जब तक आंख खुली है। आंख बंद होने के बाद कुछ नहीं है। अत : किस पर गर्व कर रहे हो ?


           चोर की इस एक पंक्ति ने राजा की आंखें खोल दीं। उसे सम्यक् दृष्टि मिल गई। वह चारों ओर विस्फारित नेत्रों से देखने लगा - ऐसी ज्ञान की बात किसने कही ? कैसे कही ?


       उसने आवाज दी, पलंग के नीचे जो भी है, वह मेरे सामने उपस्थित हो। चोर सामने आ कर खड़ा हुआ। फिर हाथ जोड़ कर राजा से बोला ,

      हे राजन! मैं तो यहां चोरी करने आया था लेकिन आप के द्वारा पढ़ा जा रहा श्लोक सुनकर यह भूल गया कि मैं चोर हूं। मेरा काव्य प्रेम उमड़ पड़ा और मैं चौथे चरण की पूर्ति करने का दुस्साहस कर बैठा। 

हे राजन ! मैं अपराधी हूँ। मुझे क्षमा कर दें। राजा ने कहा, तुम अपने जीवन में चाहे जो कुछ भी करते हो, इस क्षण तो तुम मेरे गुरु हो। तुमने मुझे जीवन के यथार्थ का परिचय कराया है। आंख बंद होने के बाद कुछ भी नहीं रहता - यह कहकर तुमने मेरा सत्य से साक्षात्कार करवा दिया। गुरु होने के कारण तुम मुझसे जो चाहो मांग सकते हो। चोर की समझ में कुछ नहीं आया लेकिन राजा ने आगे कहा -- आज मेरे ज्ञान की आंखें खुल गई। इसलिए शुभस्य शीघ्रम् - इस सूक्त को आत्मसात करते हुए मैं शीघ्र ही संन्यास लेना चाहता हूं। राज्य अब तृण के समान प्रतीत हो रहा है। तुम यदि मेरा राज्य चाहो तो मैं उसे सहर्ष देने के लिए तैयार हूं। 


चोर बोला, राजन ! आपको जैसे इस वाक्य से बोध पाठ मिला है, वैसे ही मेरा मन भी बदल गया है। मैं भी संन्यास स्वीकार करना चाहता हूँ। राजा और चोर दोनों संन्यासी बन गए। 


            एक ही पंक्ति ने दोनों को स्पंदित कर दिया। यह है सम्यक द्रष्टि का परिणाम। जब तक राजा की दृष्टि सम्यक् नहीं थी, वह धन - वैभव, भोग - विलास को ही सब कुछ समझ रहा था। ज्यों ही आंखों से रंगीन चश्मा उतरा , दृष्टि सम्यक् बनी कि पदार्थ पदार्थ हो गया और आत्मा-आत्मा।







December 11, 2021

उजास ujaas kavita आकिब जावेद

उजास

 दिनभर खालीपन से ऊब कर,
शाम ने आखिर करवट बदल ली,
रात ले आयी तिमिर !
जिसमें था ;डर, भय,निराशा,
सुबह लेकर फिर आयी,
उम्मीद,आशा,हौसला,
जीवन में
होगा पुनः
उजास!

-आकिब जावेद 
बाँदा,उत्तर प्रदेश
December 04, 2021

बहुत उलझन में हूँ। bahut ualjhan me hun

 बहुत उलझन में हूँ

रस्ते भटक रहे है अब!
कंकड़ियां सवाल कर रही मुझसे,
जवाब किसी गुफ़ा में चले गए है।
नदी में समुद्र कूद रहा है मौन सा,
पौधे पेड़ो से करते है चतुराई,
बहुत उलझन में हूँ!
शोर ने ताला लगा दिया मौन पर,
उलझने दिमाग से करे शिकायत,
वहस ज़िन्दा निगल रही ज़िन्दगी,
क्रूरता ने ख़ूबसूरती पे डाला पहरा।
बहुत उलझन में हूँ,
रस्ते भटक रहे है अब!
ख़ामोशियाँ ले रही अँगड़ाई,
चुप्पी गुम किसी सीवान में,
लहरें उफ़ान मार रही मौज़ो पर,
ज्वार कब से उठ रहा दिल में।
बहुत उलझन में हूँ,
रस्ते भटक रहे है अब!
चाहतो पे ज़रूरत भारी,
ख़्वाब में हक़ीक़त हावी,
सुख-चैन छिन रहा सब,
जबसे जिम्मेवारी आयी।
बहुत उलझन में हूँ,
रस्ते भटक रहे है अब!

-आकिब जावेद
बाँदा,उत्तर प्रदेश
9506824464
December 02, 2021

कविता -आवाज़े आईना Awaz Aaina कवि मुकेश भटनागर

 आवाज़े आईना        


एक बार तो सुनो कभी आवाज़े आईना

हमको हमारा हाल सुनाता है आईना

आवाज़े आईना एक राज़े आईना

एक बार तो सुनो कभी आवाज़े आईना

हमको हमारा हाल सुनाता है आईना


बेख़ौफ़ बेफिक्र रहता है आईना

हाज़िरजवाब हरदम नाज़ुक सा आईना

चेहरे पे दाग़ है या तिल कहता है आईना


राजा रंक दोनों से कहता है आईना

बंदे हैं एक ख़ुदा के बताता है आईना

वक़्त वक़्त की है बात बताता है आईना


एक बार भी जो बात आईने से ना कर सका

राहे खुदा पे वो कभी आगे ना बढ़ सका

कहता है हर शख्स से घर घर का आईना


बेज़ुबान आईना सच ही बोलता है

रूबरू जो बैठो एकदम से बोलता है

सोया नहीं है एक पल सदियों से आईना


कवि

मुकेश भटनागर"आवाज़,

 वैशालीनगर, भिलाई

93036 55494

December 02, 2021

मातृभूमि के प्रति/matribhumi ke prati/देश भक्ति कविता

 "मातृभूमि के प्रति"


पशु तुल्य हैं वो लोग जो कहें -

           "मातृभूमि पे हमारे एहसान हैं"


आदमी हैं वो लोग जो कहें -

            "मातृभूमि के हम पर एहसान हैं"


इंसान हैं वो लोग जो कहें -

      "मातृभूमि पे मिटने हेतु हमारे अरमान हैं


महान हैं वो सैनिक,

    मातृभूमि के प्रति जिनके जीवन बलिदान हैं।


अति महान हैं वो माता पिता,

      जिनके बेटों के शहीदों में नाम हैं ।


महानतम हैं वो नारियां,

        जिनके आंसू सूख चुके हैं और जिनके सुहाग का शहीदों की सूची में नाम है ।।


कवि

मुकेश भटनागर"आवाज़",वैशालीनगर,भिलाई

93290 07369

December 02, 2021

कवि मुकेश भटनागर "आवाज़" का जीवन परिचय Mukesh bhatnagar ki kavitaye or jivan parichay

 मुकेश भटनागर "आवाज़" का जीवन परिचय 


परिचय

नाम            मुकेश भटनागर "आवाज़"
पिता          स्व.श्री कन्हैय्यालाल जी भटनागर
माता          स्व. श्रीमती लक्ष्मी देवी भटनागर
पत्नी          श्रीमती प्रेमसुधा भटनागर
सुपुत्र             डॉ. अजीत सिंह भटनागर
सुपुत्री           डॉ. श्रीमती विधि भटनागर
दामाद           श्री अमित भटनागर
नतनियाँ        आर्शिया एवं आलिया
जन्मतिथि      13 सितंबर 1955
जन्मस्थान      अमरोहा मुरादाबाद यूपी
शिक्षा            बीएससी, एमए, एलएलबी

व्यवसाय -    बैंक ऑफ बड़ौदा की महाराष्ट्र, गुजरात,मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ की विभिन्न शाखाओं में 1976 से 2015 तक सेवाएं प्रदान कर अब सेवानिवृत्त वरिष्ठ शाखा प्रबंधक

प्रकाशन         1. काव्यसंग्रह "भाव सागर"

                     (2011-2012)

                     2. "श्री ग्राहकदेव चालीसा"

                     (2013-2014)

दिल्ली,भोपाल,रायपुर,राजनंदगांव एवं भिलाई के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में एवं बैंक ऑफ बड़ौदा की राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में काव्य रचनाओं,लघु कथाओं,संस्मरणों का प्रकाशन                 

सम्पादन-  जिला राजभाषा क्रियान्वयन समिति राजनांदगांव के तत्वावधान में वार्षिक पत्रिका "राजभाषा दर्पण" 1999 एवं 2000 के मुख्य संपादन कार्य निष्पादन

सम्मान --  

1 "काव्य भूषण सम्मान" -  छत्तीसगढ़ साहित्यकार परिषद बिलासपुर द्वारा 

2 "काव्य गौरव सम्मान" - सृजन साहित्य समिति कोरबा द्वारा

3 "काव्य कोहिनूर सम्मान"- श्री चित्रगुप्त साहित्य समिति भिलाई दुर्ग द्वारा

4 "काव्य रत्न सम्मान"- रचना साहित्य समिति गुरुर बालोद द्वारा

5 "काव्य कुलभूषण सम्मान"- चित्रांश कल्याण सेवा समिति बिलासपुर द्वारा

6 भिलाई इस्पात संयंत्र, भिलाई रिफेक्टरी प्लांट, यूको बैंक सेक्टर1, द्वारा हिंदी दिवस तात्कालिक भाषण प्रतियोगिताओं में कई वर्षों तक प्रथम द्वितीय नगद पुरुस्कार एवं प्रमाण पत्र प्राप्तकर्ता

7 बैंक ऑफ बड़ौदा की राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं, इनके काव्य/लेख संग्रहों का प्रकाशन।

रचनाएं

1   सरस्वती वंदना

2   आवाज़े आईना

3  मातृभूमि के प्रति





November 25, 2021

हमीद कानपुरी के ग़ज़ल/dilo me samana agr chahte ho ghazal

 ग़ज़ल

दिलों  में   समाना   अगर  चाहते हो।
सियासत  में आना अगर  चाहते हो।

कभीकल पेटालो नहीं काम हरगिज़,
सदा   मुस्कुराना  अगर  चाहते   हो।

ये मुमकिन  बहुत है  मिटे भाईचारा,
सखा  आज़माना  अगर  चाहते  हो।

हिफाज़त करो जानदेकर भीइसकी,
वतन  जगमगाना  अगर चाहते  हो।

तरफदार  बनिये  नहीं  ग़लतियों के,
शिकायत  मिटाना  अगर चाहते हो।

गुलों को  मयस्सर  करो रंग खूं का,
चमन को  सजाना अगर चाहते हो।

बुराई  का  बदला भलाई  से  देना,
किसी को  हराना अगर चाहते हो।

हमीद कानपुरी
अब्दुल हमीद इदरीसी,
वरिष्ठ प्रबन्धक, सेवानिवृत,
पंजाब नेशनल बैंक,
मण्डल कार्यालय, कानपुर-208001

November 25, 2021

पुरूष होना आसान नहीं/kavita Purush kavyitri Anju lakhnavi

 पुरुष

Purush

पुरुष होना 
आसान कहाँ था... 
खामोशी से सबकी 
ख्वाहिश का जिम्मां लेना
आसान कहाँ था... 
पंक्ति में आगे होने पर भी
लेडीज फर्स्ट कहना
आसान कहाँ था... 
माँ,पत्नी हैं ईस्ट- वेस्ट सी
सामंजस्य बिठाना
आसान कहाँ था... 
खुद के नखरे भूल
सुबह की ट्रेन पकड़ना
आसान कहाँ था.... 
क्रिकेट,पेंटिंग,गजलें भुला 
दवा के पर्चे रखना याद
आसान कहाँ था.... 
जिम्मेदारी को 
फर्ज समझना 
आसान कहाँ था... 
पुरुष होना आसान कहाँ था
छिपा के आंसू मुस्कान लगाना
आसान कहाँ था... 

अंजू 'लखनवी'
अस्टिटेंट प्रोफेसर
एवं कवयित्री
November 25, 2021

बाल विवाह कवि आकिब जावेद/baal vivah/chhoti उम्र me bachcho की shaadi नहीं करना चाहिए

बाल विवाह

बाल विवाह

 बचपन  मे  दिन  बीते खेल- कूद करते हुए,
बारिश  में भींग जाते उछल कूद करते हुए।
खेल हमारे अलग - अलग से हुआ करते थे,
काम से होते ही फुरसत हम खेला करते थे।

लड़के-लड़कियों का खेल अलग अलग बंटे थे,
लड़कियों के साथ गुड्डा-गुड्डी,खो-खो खेलते थे।
लड़को के साथ छुपन - छुपाई ,गेंद - गिप्पा थे,
छेड़कानी होती थोड़ा हम ना समझ डिब्बा थे।

थोड़ी बड़ी होकर जब पहुँची उच्च पाठशाला,
ऐसा कुछ  घटित हुआ मेरा मन हुआ काला।
पहली बार हुआ शरीर जब खून से लथपथ,
सहेली ने दूर किया मेरे मन का भी खटपट।

उच्च  पाठशाला पास करते मेरी हो गयी शादी,
पति न अच्छा मिल पाया कैसी किस्मत ला दी।
खेल - खेल  की  उम्र  में मैँ भी बन गयी थी माँ,
खेल - खेल में  ज़िन्दगी की  निकल रही है जाँ।

-आकिब जावेद
स्वरचित एवं मौलिक
बाँदा,उत्तर प्रदेश
November 24, 2021

राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष (24 जनवरी) / कविता - बेटियाँ

राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष (24 जनवरी) 


शीर्षक- बेटियाँ

बंद करो अब बोझ समझना, 
मैं हर मोर्चा डटकर लड़ती हूँ, 
बेटा कहना बंद करो,मुझे अब 
मैं बेटी सुन सम्मानित होती हूँ,  

कभी जिस्म पर कभी वस्त्र पर
करते छींटाकशी,प्रयास रोकने का, 
जब भी मौका मैं पाती हूँ
भरती उड़ान फिर अंबर तक, 

गर्भ में अब भी मरती हूँ
ट्रैकों पर पडी़ भी मिलती हूँ, 
अपना सम्मान बचाने को
वस्त्रों की गठरी बन घर से निकलती हूँ, 

मैं दूर-दराज के गांवों में
बिन संसाधन भाग्य से लड़ती हूँ, 
मैं सफल रहूँ या होउं विफल
पर आक्रमण से नहीं ड़रती हूँ, 

मान तुम्हारा बढ़ा रहीं हूँ
पदक देश को दिला रहीं हूँ, 
हारी नहीं हूँ इंतेहानों से
नए मानक मैं रचा रहीं हूँ, 

अंजू 'लखनवी'
असिस्टेंट प्रोफेसर समाजशास्त्र
श्री महेश प्रसाद डिग्री कालेज ,लखनऊ
November 03, 2021

कच्चे दीये बना कर बैठ गई/कवि आकिब जावेद/Diwali par kavita kachche diye

 Deepawali par kavita 

 दीये 

कच्चे दीये बना कर बैठ गई
वो उम्मीद सज़ा कर बैठ गई!
मेरी दीवाली भी रोशन होगी
वो भी आस लगाकर बैठ गई!

कोई न आया दिये लेने पास
वो बहुत  हतास और निराश
कैसे  खुशियाँ  आयेगी पास
वो निराश - उजागर बैठ गई!

रंग  बिरंगी  सी है दुनियाँ
यहाँ  किसी  की फ़िक्र कहाँ
अपना- अपना देखते सब
किसका दामन भरा यहां।

मासूम उमर सुख पायेगी
मेरी माँ दीये बेच के आएगी!
हमें भी नए बसन दिलाएगी
हमे खूब पकवान खिलाएगी!

साब ले लो कच्चे दिए माँ के
कई सपनो को बेच रही है ये!
दीप घर में लाओ मेरी माँ के
धूप में परिश्रम कर रही है ये!

आकिब जावेद (Aakib_Javed)
स्वरचित/मौलिक