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February 01, 2022

मुहब्बत का खुला पैगाम गाँधी / हमीद कानपुरी mahatma gandhi

 

मुहब्बत  का  खुला पैगाम गाँधी

नया  एंगिल  नया आयाम  गाँधी।
हमारे  मुल्क को  इन्आम  गाँधी।

बुराई   से    रहे   लड़ते    हमेशा,
मुहब्बत का  खुला पैगाम  गाँधी।

भुलासकता नहीं सदियों ज़माना,
जहां में कर  गये वो काम  गाँधी।

अहिंसालफ़्ज़ जबआया कहींतो,
ज़बां पर आ गया है नाम  गाँधी।

किसी से तुम  करो बर्ताव  कैसा,
सिखाते थे  हमें  हर गाम  गाँधी।

कहीं कुछ ठानकर आगे बढ़ेजब,
नहीं हरगिज़  रहे  नाकाम गाँधी।

हमीद कानपुरी,
अब्दुल हमीद इदरीसी,
179, मीरपुर , कैण्ट, कानपुर- 208004
9795772415

January 25, 2022

चुनावी सियासत/ Chunavi Siyasat/हमीद कानपुरी

 ग़ज़ल/ghazal/चुनावी सियासत/Chunavi Siyasat


ज़ह्र आलूदा  चुनावी   कुल  सियासत  देखकर।
हौसला होता  नहीं  लड़ने  का नफरत  देखकर।

पहले मिसरे की नज़ाकत औ लताफ़त देखकर।
खुश हुई महफ़िल बला की ये ज़हानत देखकर।

मंज़िलों  की   सिम्त  बढ़ते  जा रहे  मेरे  क़दम,
कुल जहां  हैरत   ज़दा  मेरी  हरारत   देखकर।

साफ़ सुथरी  दूर तक दिखती नहीं है अब कहीं,
शर्म आती आजकल की बदसियासत देखकर।

ग़लतियाँ उससे  हुईं  हैं  अनगिनत इस  दौर में,
कुछ नहीं कहताकोई लेकिन शराफ़त देखकर।

हमीद कानपुरी,
अब्दुल हमीद इदरीसी,
179, मीरपुर, छावनी, कानपुर-208004
January 25, 2022

मुफ़लिसों को दुनिया मे क्या कोई अधिकार नही

 ग़ज़ल/Ghazal


मुफ़लिसों को दुनिया में क्या कोई अधिकार नही
पास है हिम्मत की ताकत समझो तुम लाचार नही।।

लोग गरीबी की अक्सर  खूब खिल्ली  उड़ाते हैं 
इंसान नही हैं ऐसों पर बोलो क्यों धिक्कार नहीं ।।

चारो तरफ घना अँधेरा नही रोशनी की गुंजाइश 
हर  हाथों  में नफ़रत है  प्यार कहीं दरकार नहीं ।। 

जीवन में संघर्ष बहुत जिनसे लड़ना - मरना है
जीत गए तो जीत है अपनी हार गए तो हार नही।।

बैठे हैं बिकने की खातिर दुनियां के बाजारों में
लेकिन ईमां  न बेचूंगा कहीं किसी बाजार नही।।

-आकिब जावेद 
बाँदा,उत्तर प्रदेश
पिन-210203
सम्पर्क- बाँदा,उत्तर प्रदेश
January 16, 2022

Nizam fatehpur ke ghazal निज़ाम फतेहपुरी के ग़ज़ल

 ग़ज़ल

ग़ज़ल- 1212  212  122  1212  212  122

अरकान- मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन

वतन का खाकर जवाँ हुए हैं वतन की खातिर कटेगी गर्दन। 
है कर्ज हम पर वतन का जितना अदा करेंगे लुटा के जाँ तन।।

हर एक क़तरा निचोड़ डालो  बदल दो रंगत वतन की यारो।
जहाँ  गिरेगा   लहू   हमारा   वहीं   उगेगा   हसीन  गुलशन।।

सभी ने हम पर किए हैं हमले किसी ने खुलकर किसी ने मिलकर।
खिला है जब-जब चमन हमारा हुए हैं इसके हजारो दुश्मन।।

दिखाएं किसको ये ज़ख्म दिल के खड़े हैं क़ातिल बदल के चेहरे।
जिन्होंने लूटा था  आबरू  को  वही  बने  हैं अज़ीज़े दुल्हन।।

हमारा बाज़ू कटा जो  तन  से  वो  तेग़  लेकर हमी पे झपटा।
समझ न आया 'निज़ाम' हमको अजब हक़ीकत हुई है रौशन।।

निज़ाम-फतेहपुरी
ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर
ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत
मोबाइल नंबर- 6394332921  9198120525

January 01, 2022

निज़ाम-फतेहपुरी के ग़ज़ल /Nizam fatehpuri ke ghazal

 ग़ज़ल- बहरे कामिल मुसम्मन सालिम

अरकान- मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
वज़्न- 11212  11212  11212  11212

वो बचा रहा है गिरा के जो, वो अज़ीज़ है या रक़ीब है।
न समझ सका उसे आज तक, कि वो कौन है जो अजीब है।।

मेरी ज़िंदगी का जो हाल है, वो कमाल मेरा अमाल है।
जो किया उसी का सिला है सब, मैंने ख़ुद लिखा ये नसीब है।।

जिसे ढूँढता रहा उम्र भर, रहा साथ-साथ दिखा न पर।
मेरा साथ उसका अजीब है, न वो दूर है न क़रीब है।।

जहाँ दिल में प्यार बसा हुआ, वहीं जन्म शायरी का हुआ।
जो क़लम से आग उगल रहा, वो नजीब है न अदीब है।।

भरी नफ़रतें जहाँ दिल में हों, वहाँ दिल सुकूँ कहाँ पाएगा।
जो फ़िज़ा में ज़हर मिला रहा, वो मुहिब नही है मुहीब है।।

वो डरे ज़माने के ख़ौफ़ से, जिसे मौत पर है यक़ीं नहीं।
मैं डरूँ किसी से जहाँ में क्यूँ, मेरे साथ मेरा हबीब है।।

यहाँ आया जो उसे जाना है, यही ला-फ़ना वो निज़ाम है।
है करम ख़ुदा का उसी पे सब, जो अमीर है न ग़रीब है।।

निज़ाम-फतेहपुरी
ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर
ज़िला- फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत
मोबाइल नंबर- 6394332921
January 01, 2022

नववर्ष पर ग़ज़ल कवि आकिब जावेद New year kavita

  नववर्ष /new year

वर्ष और घर-द्वार बदलते देखें हैं
जां से प्यारे  यार  बदलते  देखें हैं।

देखा है दिल पे कुछ होठों पे कुछ
पल-पल किरदार बदलते देखें हैं।

नफ़रत देखी,देखा हमने  प्यार
चेहरे सौ-सौ बार बदलते देखें हैं।

हर बार उसे अपना समझा जाना
लेकिन बारम्बार बदलते देखें हैं।

मुझे तोड़कर  वो खुद कितना रोया
उल्फ़त के बीमार बदलते देखें हैं।

✍️आकिब जावेद
बाँदा,उत्तर प्रदेश
November 25, 2021

हमीद कानपुरी के ग़ज़ल/dilo me samana agr chahte ho ghazal

 ग़ज़ल

दिलों  में   समाना   अगर  चाहते हो।
सियासत  में आना अगर  चाहते हो।

कभीकल पेटालो नहीं काम हरगिज़,
सदा   मुस्कुराना  अगर  चाहते   हो।

ये मुमकिन  बहुत है  मिटे भाईचारा,
सखा  आज़माना  अगर  चाहते  हो।

हिफाज़त करो जानदेकर भीइसकी,
वतन  जगमगाना  अगर चाहते  हो।

तरफदार  बनिये  नहीं  ग़लतियों के,
शिकायत  मिटाना  अगर चाहते हो।

गुलों को  मयस्सर  करो रंग खूं का,
चमन को  सजाना अगर चाहते हो।

बुराई  का  बदला भलाई  से  देना,
किसी को  हराना अगर चाहते हो।

हमीद कानपुरी
अब्दुल हमीद इदरीसी,
वरिष्ठ प्रबन्धक, सेवानिवृत,
पंजाब नेशनल बैंक,
मण्डल कार्यालय, कानपुर-208001

October 30, 2021

निज़ाम-फतेहपुरी के ग़ज़ल/Nizam Fatehpuri ke ghazal/गजल

 निज़ाम फतेहपुरी

ग़ज़ल- 221 2122  221 2122

अरकान-मफ़ऊल फ़ाइलातुन मफ़ऊल फ़ाइलातुन

सारे जहाँ में कोई, हमदम नहीं हमारा।
हमदर्द बन के आख़िर, सब ने किया किनारा।।

नादान दिल को मेरे, धोखा दिया उन्होंने।
जिनका था ज़िंदगी में, हमको फक़त सहारा।।

अनजान बन गए वो, बर्बाद करके मुझको।
फिर भी ये दिल उन्हें  कुछ, कहता नहीं बेचारा।।

अरमान दिल के सारे, दिल में मचल रहे हैं।
अर्ज़े वफा भी करना, हमको नहीं गंवारा।।

रुख़ से नक़ाब हटते, इक आह दिल से निकली। 
मैं बेखुदी में उनका, करता रहा नजारा।।

तारीकियों में भटके, इस आस पर सदा हम।
चमकेगा एक दिन तो, तक़दीर का सितारा।।

मरने का ग़म नहीं है, ग़म तो निज़ाम ये है।
अपनी ही सादगी ने, अपना गला उतारा।।

निज़ाम-फतेहपुरी
ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर
ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
6394332921
9198120525
October 28, 2021

सफर के लिए Safar ke liye chalte rhenge/Mohabbt karte rhenge

 सफर के लिए

सफर के लिए हम निकलते रहेंगे

दुआ माँ की लेकर यूँ चलते रहेंगे

अन्जुमन में है चाहने वाले मेरे
यहाँ सबसे मोहब्बत करते रहेंगे

बदल कर कभी हर्फ़ तुमको पढेंगे
नए ज़ाविये से हम लिखते रहेंगे

जलेगी मुहब्बत शमा की हमेशा
चेराग ए मुहब्बत यूँ जलते रहेंगे

रफ़ू कर ले तू भी ग़मो को यूं 'आकिब'
मुहब्बत से घर अपने पलते रहेंगे
✍️आकिब जावेद
बाँदा,उत्तर प्रदेश

June 15, 2021

ग़ज़ल निजाम फतेहपुरी

 ग़ज़ल

221 2122  221 2122

अरकान- मफ़ऊल फ़ाइलातुन मफ़ऊल फ़ाइलातुन

अंगूर की ये बेटी कितनी है ग़म कि मारी।
रहती है क़ैद हरदम बोतल में ये बेचारी।।

बेबस समझ के इसको जिसने भी चाहा छेड़ा।
कितनों ने साथ इसके यूँ रात है गुजारी।।

दर-दर भटक रही है सड़कों पे बिक रही है।
है बदनसीब  कितनी अंगूर  की दुलारी।।

गलियों से ये महल तक हर रात बनती दुल्हन।
देखो नसीब इसका फिर भी रही कुंवारी।।

ग़म हो या हो खुशी ये होती शरीक सब में।
फिर भी इसे बुरी क्यों कहती है दुनिया सारी।।

दिल टूटा जब किसी का इसने दिया सहारा।
ग़म के मरीज़ों को है ये जान से भी प्यारी।।

समझा न ग़म किसी ने देखो निज़ाम इसका।
हँस-हँस के सह रही है हर ज़ुल्म ये बेचारी।।

निज़ाम-फतेहपुरी
ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर
ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
6394332921
9198120525

June 15, 2021

ठहर जाये (ग़ज़ल)

 ग़ज़ल


कोई  ज़िन्दा   रहे   न  मर  जाये।
नब्ज़  जो  एक पल   ठहर  जाये।

दूर  तक  जब  नहीं  नज़र  जाये।
है  ये  बेहतर   बशर  ठहर  जाये।

हर तरफ  दिख  रही  वबा  फैली,
जिस तरफभी जिधर नज़र जाये।

पार  दुश्मन   करे   नहीं   सरहद,
सर  ये बाक़ी  रहे  कि सर  जाये।

रब का  मेरे  अगर  करम  हो तो,
बात बिगड़ी हर इक  सँवर जाये।

फिर न रहता अदब किसी का भी,
आँख  से  शर्म  जब  उतर  जाये।

हमीद कानपुरी,
अब्दुल हमीद इदरीसी,
वरिष्ठ प्रबन्धक ,सेवानिवृत,
पंजाब नेशनल बैंक,
मण्डल कार्यालय,कानपुर
June 04, 2021

ग़ज़ल ghazal

 ग़ज़ल


हर किसी से  उसे मिले  उल्फत।
पाल रक्खी  अजीब सी  चाहत।

कर  रहे  सब   गरीब  से   वादा,
पर सुधरती न दिख रही हालत।

काश  होता निज़ाम  ऐसा  कुछ,
जिससेमिलती ग़रीबको ताक़त।

कर  रहे  आज  जो  यहाँ लीडर,
देखकर मन  हुआ बहुत आहत।

साथ  उसके   रहूँ ,  हसूँ,   खेलूँ,
इतनी अच्छी नहीं मेरी किस्मत।

वो ही अक्सर  है आदमी  करता,
जिसकी जैसी  हुआ करे आदत।

साथ  हरदम  मुझे  मिले  उसका,
आज दिल में   हमीद के  चाहत।



हमीद कानपुरी,
अब्दुल हमीद इदरीसी,
वरिष्ठ प्रबन्धक, सेवानिवृत,
पंजाब नेशनल बैंक,
मण्डल कार्यालय,कानपुर-208001
June 04, 2021

गजल (हामिद कानपुरी)

गजल


पागलपन  को  इज़्ज़त  कैसी।
नफरत   से  ये  उल्फत  कैसी।

काबिल अपना लीडर  है  पर,
जनता  की  है  हालत  कैसी।

दंगा    दंगा    खेल   रहे   सब,
झेल  रहे  हम  आफत  कैसी।

मँहगी  मँहगी  चीज़ यहाँ सब,
आखिर   ये  है   राहत  कैसी।

सन्यासी    हो    माना   हमने,
सत्ता की  फिर  चाहत  कैसी।

नफरत नफरत दिखती हर सू ,
उल्फत  की  है आदत  कैसी।



हमीद कानपुरी,
अब्दुल हमीद इदरीसी,
वरिष्ठ प्रबन्धक,
पंजाब नेशनल बैंक,
मण्डल कार्यालय, कानपुर
208001

October 09, 2020

निज़ाम-फतेहपुरी के ग़ज़ल Nizam fatehpur ke ghazal

 ग़ज़ल- 122 122 122 122

अरकान- फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

मुझे रास आई न दुनिया तुम्हारी।
परेशां  तुम्हारा  यहाँ  है  पुजारी।।

सुखी है वही जो ग़लत है जहाँ में।
सही आदमी बन गया है भिखारी।।

दरिंदे हैं बे-ख़ौफ़ कितने यहाँ पर।
सरेआम लुटती बाजारों में नारी।।

जो सौ में सवा सौ काहे झूठ यारों।
वही रहनुमा बन  गया है मदारी।।

यही डर है सबको सही बोलने में।
कहीं घट न जाए ये इज़्ज़त हमारी।।

बड़ा तो वही है जो चलता अकड़ कर।
शरीफों का जीना जहाँ में है भारी।।

निज़ाम अब कहाँ जाए या रब बताओ।
भरी है बुराई  से  दुनिया  ये सारी।।

निज़ाम-फतेहपुरी
ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर
ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
October 09, 2020

हमीद कानपुरी के ग़ज़ल Hamid kanpur ke ghazal

 ग़ज़ल


आफत ली जिसकी सर पर।
फेंक  रहा   वो   भी  पत्थर।

सख्त   ज़रा    होता    नेचर।
अफसर   होता  है  अफसर।

मिलता जिसको  भी अवसर।
काम   लगाता    है   जमकर।

आग    लगाता   फिरता   वो,
फूँस   लगा  जिसका  छप्पर।

तुम  रूठे  हो   या  खुश   हो,
मुझको   पड़ता   है   अन्तर।

प्यार   करेगी   दुनिया   फिर ,
सीखा  जो   उल्फत    मंतर।

खुशियाँ  कम ,ग़म ज़्यादा दे,
प्यार  मुहब्बत  का  चक्कर।

खूब  शजर  पर  आये  फल,
आयेंगे    फिर    तो   पत्थर।


हमीद कानपुरी
अब्दुल हमीद इदरीसी
October 09, 2020

निज़ाम-फतेहपुरी Nizaam Fatehpur ke ghazal

 ग़ज़ल-  212  212  212  212

अरकान- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

बात  सच्ची  कहो  पर  अधूरी   नहीं।
लोग   माने  न   माने   ज़रूरी   नहीं।।

आज जो  है  जहाँ  कल  रहेगा वहाँ।
जानकारी  किसी  को  ये  पूरी  नहीं।।

जिनको नफ़रत थी हमसे जुदा हो गए।
दूर  रह  कर  भी  उनसे  है  दूरी  नहीं।।

दोस्ती दिल से की दुश्मनी खुल के की।
साफ दिल  हूँ  बगल  में  है  छूरी नहीं।।

मुँह पे कहता बुरे  को  बुरा ये निज़ाम।
अपनी फितरत में  है  जी हज़ूरी नहीं।।

निज़ाम-फतेहपुरी
ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर
ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
October 09, 2020

हमीद कानपुरी के ग़ज़ल Hamid kanpur ke ghazal

 ग़ज़ल


ख़ूं  से अपने वतन  को सजाते चलो।
ख़ूबसूरत   इसे   तुम   बनाते   चलो।

ग़म जहाँ  हो खुशी तुम लुटाते चलो।
जश्न हर  ज़िन्दगी  का  मनाते चलो।

जीत का  जश्न खुलकर मनाते चलो।
पस्तियों  के निशां  सब मिटाते चलो।

हमसफर  अब उसे  भी  बनाते चलो।
राह  में   जो  गिरा   है   उठाते  चलो।

बस्तियाँ  प्यार  की  तुम बसाते चलो।
दर्दो  गम  सादगी   से  भुलाते  चलो।

देन  क़ुदरत की तुझको मिली ख़ूबरू,
काम सब  मुस्करा  कर बनाते  चलो।

गर  थमा  ही  रहे  तो  यक़ीनन सड़े,
प्यार  दरिया  है उसको  बहाते चलो।

हमीद कानपुरी,
अब्दुल हमीद इदरीसी,
October 09, 2020

निज़ाम फतेहपुरी Nizam fatehpur ke ghazal

 ग़ज़ल-  212  212  212  212

अरकान- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन


बात  सच्ची  कहो  पर  अधूरी   नहीं।
लोग   माने  न   माने   ज़रूरी   नहीं।।

आज जो  है  जहाँ  कल  रहेगा वहाँ।
जानकारी  किसी  को  ये  पूरी  नहीं।।

जिनको नफ़रत थी हमसे जुदा हो गए।
दूर  रह  कर  भी  उनसे  है  दूरी  नहीं।।

दोस्ती दिल से की दुश्मनी खुल के की।
साफ दिल  हूँ  बगल  में  है  छूरी नहीं।।

मुँह पे कहता बुरे  को  बुरा ये निज़ाम।
अपनी फितरत में  है  जी हज़ूरी नहीं।।

निज़ाम-फतेहपुरी
ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर
ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
September 30, 2020

ग़ज़ल ghazal आकिब जावेद

 चुप है भगवान

 हँसता हैवान


देख देख के
सब परेशान

दरिंदे बने है
लेते है जान

अस्मत लुटे
इंसा शैतान

विकृत रुप
क्या है मान

माँ बेटी बहन
इनका अपमान

बालिका दिवस
झूठी है शान

निवेदन सबसे
न लीजिये जान

-आकिब जावेद
September 30, 2020

ग़ज़ल Ghazal आकिब जावेद

Ghazal ग़ज़ल 

 तेरी ख़ुमारी मुझपे भारी हो गई है।

उम्र की  मुझपे  उधारी हो गई है।।

मुद्दतों  से  खुद को ही  देखा  नही
आईने  पे  धूल  भारी  हो  गई  है।।

चाहकर भी  मौत अब न  मांगता ।
ज़िन्दगी अब  जिम्मेदारी हो गई है।।

छुपके-छुपके देखते जो आजकल।
उनको भी चाहत हमारी हो गई है।।

जिनके संग जीने की कस्मे खाईं थीं
उनको मेरी ज़ीस्त भारी हो गई है।।

चंद दिन गुज़ारे जो तेरे गेसुओँ में।
कू ब कू चर्चा हमारी हो गई है।।

कह रहा मुझसे है आकिब ये जहां
दुश्मनो  से खूब  यारी  हो  गई है।।

-आकिब जावेद