दिवास्वप्न ’
“ क्या मुॅ॑ह पर उसने रख लिया आँखें चुरा कर
ठोड़ी के नीचे उसने धरा मुस्कुरा कर ।
आॅ॑खें आपस में मिल गई उस वक्त
जब हाथ मिलाया मुस्कुरा कर ।।
अपनी तो जिस्त हैं वफ़ा के साथ
सुनना पड़ा उसको हैं सैकड़ों के बीच।
किन्तु उसने !
पर्दें पर अपना दिखाया हाथ, जब देखा किसी ने नहीं
आंखें उसकी भी मुस्कुरा दी ,उस महफ़िल में आज ।।
ये सब दिल के ख़्वाब थे , आॅ॑खों के पास
देखा जब संभलकर तो!
न हाथ थे ,न तस्वीर इन आॅ॑खों के पास
फिर जरा संभाली दुपट्टा बालों के साथ ।।
रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश।

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