प्रिये तुम्हें बताऊँ कैसे
प्रिय, तुम्हें बताऊँ कैसे।तेरे सम्मुख आऊं कैसे।।
मोह द्रोह से भरी हुई हूँ
षड् विकार से घिरी हुई हूँ।
जग में सबसे डरी हुई हूँ
प्रियतम तुम्हें मनाऊँ कैसे।।
माया जग मे डेरा डाले
मोह द्रोह ईर्ष्या है पाले।
तृष्णा के बहते हैं नाले
मै दुख अपना सुनाऊँ कैसे।।
पाखंड बाद चरम पर है
यहां न कोई धरम पर है।
ना अपने करम पर है
मै शुभ को गले लगाऊँ कैसे।।
नारियों का अपमान यहां है
कोई ना सम्मान यहां है।
केवल फैला अभिमान यहां है
अश्रुओं के अर्घ्य चढ़ाऊं कैसे।।
सब निजता मे रहते माते
भक्षाभक्ष्य सब हैं खाते।
बचे हैं केवल तेरे नाते
दिल की आग दिखाऊँ कैसे।।
घोर पाप फैला है जग मे
सुख शांति ना मानव मग में।
कठिनाई है पग - पग में
काँटों का हार पहनाऊँ कैसे।।
विदा ले रहे अन्न औ पानी
मैली हो गयी चूनर धानी।
इति पर पहुंची सारी कहानी
पुनः दया मै पाऊँ कैसे।।
जग मे फैला प्रदूषण भारी
उससे दुःखी हैं सब नर - नारी।
भूले दायित्व हुए दुखारी
उनको कर्तव्य समझाऊँ कैसे।।
स्वरचित मौलिक
।। कविरंग।।

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