नृत्य ’
“चुम्बन महोत्सव में स्त्री का उन्मुक्त व्यवहार
आलोचकों का रास रंग होता हैं।
उत्साह ,ऊर्जा के साथ ठुमकों का प्रदर्शन
देवलोक की अप्सरा सा लगता हैं ।
खान पान और रास रंग के प्रति
नवनिर्वाण सा खुलापन!
शारीरिक सौंदर्य उनका ,
मानों दर्पण सा लगता हैं
मधुर स्वप्न में खामोश स्वर भी
विस्मृत यात्री के जैसे यायावर सा लगता हैं
उस मील खड़ी धानी चूनर वाली में
मानों !
पूरे आभा मण्डल का संवाद झलकता हैं।।
रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश

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