।। गुरु महिमा।।
प्रथम पूज्य हैं गुरूजी,छूता पहले पाद।
मूढ़ अज्ञानी मै महा,
सूना अनहद नाद।।
गुरु बिनु ज्ञान न पावहि प्रानी ।माया मोह सदा लपटानी।।
अगुन सगुन भय भेद विवेका। सबय दिये सुनु राम अनेका
ज्ञान सबहि कर बड़ रखवारा।जीव जगत जानहि आचारा
जगत महुँ दुखी जीव अज्ञानी।गुरु बिनु को हरिहैं मै जानी
ज्ञान धाम गुरु सुखकर दाता।तिनके चरनन मन न अघाता
उनके पद की माया दासी। मोह सूल तम अविद्या नासी
गुरु सेवा कर फल है भारी। गुरु सो विमुख दुखी नर-नारी
गुरु महिमा के विषय मे, सकुचि शारदा शेष।
मै कस कहहुं मन्द-मति, सुनि चुप रहे गणेश।।
स्वरचित मौलिक
।। कविरंग।।

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