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Band sanduk बंद सन्दूक

लघुकथा -  बंद संदूक


अस्पताल का एक कमरा जिसमें जोगई काका आंखें खोले। सामने फिर वही बेस्वाद दवाओं की पोटली जिसे खाने पर उबकाई आने लगती उसे देखते ही वह आंखें पुनः बंद कर लिए और मन में सोंचने लगे कि कब इस अस्पताल से माता रानी छुटकारा देंगी। साथ सेवा के लिए उनका पुत्र गोपू भी बैठा है और प्रेम से अपने पिता जी को काका कहता है।
गोपू - काका आंखें खोलो मंजन कर लो तथा कुछ नाश्ता करके दवाओं को खाना है न।
जोगई काका - अब मैं ऊब गया हूँ इन दवाओं से मुझे अब घर चलना है मेरी मृत्यु घर पर ही हो मै अन्यत्र नहीं मरना चाहता।
गोपू - ऐसा अशुभ बात नही करना चाहिए काका अब आपकी हालत में सुधार हो रहा है।
जोगई - बाबू बारिश का क्या हाल है अभी बारिश बंद हुई कि नहीं?
गोपू - नहीं काका बारिश और तेज हो गयी है मानो फसल जो तैयार है उसे प्रभू सड़ा कर ही छोड़ेंगे।
      इतने में डाक्टर साहब  प्रवेश करते हैं और कहते हैं कि अब आप लोग यहां से जा सकते हैं क्योंकि इस बीमारी में लम्बी दवा चलेगी आप लोगों का यहाँ अधिक खर्च पड़ेगा तथा डिस्चार्ज लिस्ट देख लो जिससे हिसाब - किताब हो जाय।
गोपू - लिस्ट जोगई काका को दिखाता है, कहता है कि काका छः हजार रुपये देना है तब जाकर छुट्टी यहाँ से मिलेगी।
काका - अपने मन मे सोंच रहे हैं मैं यहाँ बेहोशी में लाया गया मेरा संदूक तो घर पर पड़ा है और मैं चाभी भी गोपू को दे नहीं सकता उसमें मेरे जीवन की सारी कमाई है मैं किसी भी हालत में चाभी दे नहीं सकता।
गोपू - काका आपके पास कुछ पैसे हैं।
जोगई - बेटा पैसा तो यहां नहीं है जाओ मेरा संदूक घर से लेते आओ उसमें शायद कुछ रुपए हो।
गोपू - अरे काका भारी बारिश हो रही है। घर यहां से 35 किमी दूर है जिसमें 7 किमी पैदल चलना पड़ता है तथा आपका संदूक सर पर रख के लाना आसान नहीं। चाभी दे दें हम पैसा निकाल कर लेते आउंगा।
काका - बड़े जोर से डपटे ऊल्लू के पट्ठे तुम्हें कुछ पता है संदूक घर पर खुलते ही मैं जय सियाराम हो जाउंगा। मेरे जीते जी वह संदूक कोई दूसरा नही खोल सकता। वही मेरा जीवन है चले है चाभी लेने बुदबुदाते हुए आंखें बंद कर लिए।
गोपू हत्प्रभ होकर खड़ा था मन में सोंच रहा था आखिर मेरे सिवाय इनका दूसरा कोई है भी नहीं पर मेरे ऊपर जरा भी विश्वास नहीं है। यह सोंच कर उसकी आंखे भर आयी। वह चुपचाप घर के लिए वहां से चल दिया और घर आकर चालीस वर्ष पुराना संदूक सर पर रखकर भीगते हुए चल दिया। संदूक जंग खाकर जगह-जगह झड़ गया था। काका अपना संदूक पाते ही प्रफुल्लित हो उठे मालुम पड़ रहा था कि सारी बीमारी उनका ठीक हो गया। गोपू मन ही मन विचार कर रहा था कि काका को जीवन के अंतिम समय में इतनी आशक्ति ठीक नहीं।
स्व लिखित                ।। कविरंग।।
                पर्रोई - सिद्धार्थ नगर (उ0प्र0)

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