जलप्लावन
।। 1।।
गर्जत घन घमंड, रव भेदत ब्रह्मण्ड, होत ध्वनि है अखंड, वृष्टि अधिकाई है।
भयंकर हस्त मेघ, धावत नभ अभेद, वर्षा लायो महा खेद, जीना दुखदायी है।।
झिमिर - झिमिर बूँद, झहरत झरै खूब, मन मे न रहा हूब, धरा सरसाई है।
जीवन है अस्त- व्यस्त, हालत है बड़ो खस्त, घर-वार सबै पस्त, वारि वरियाई है।।
।। 2।।
वायु बहै झकझोर, दामिनी दमक जोर, कर्ण पट देत फोर, नदी बढि़याई है।
जल मे उठै तरंग, देखत जन हैं दंग, कहीं - कहीं बाँध भंग, गंग प्रलै ढाई है।।
डूबि गै फसल सब, लोग करैं काव अब, समुझै न एको ढब, आँखें भर आयी हैं।
धरती धँसत धार, जन - जन जार-जार, दिखत जल अपार, धरा धराशायी है।।
।। 3 ।।
वनारस उजरिगै, बिहार बाढ़ बढ़िगै, झारखंड भी झरिगै, वारि विपुलाई है।
रेत में चलत नाव, खोजैं लोग ऊंच ठाँव, दिखै न कवनो दाँव, यूं आफत आयी है।।
लोग सबै भूखै मरै, अन्न डेहरी मा सरै, बाहर - भीतर गरै, त्राहि-त्राहि छायी है।
सरकारी तंत्र फेल, मचा है ठेलम- ठेल, कमर में न रहा अधेल, प्रभु ना सहाई है।।
स्वरचित मौलिक । ।कविरंग ।।
पर्रोई - सिद्धार्थ नगर( उ0प्र0)

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