ग़ज़ल
बड़ी उम्मीदों से जिंदगी का सफर कटता है,
डूबी बस्तियां सैलाब में मेरा घर कटता है।
बद जुबानों पे अब लगाम लगाया जाए,
खबर है तुम्हें? ज़हर से ज़हर कटता है।
कैसे कटती है मुफलिसी में जिंदगी देखो,
इस दौर में शरीफ लोगों का ही सर कटता है।
किताबें हैं नहीं मय्यसर गरीबों को,
इसी कशमकश में कितना हुनर कटता है।
कितने दर्द मिलते है जाफरानी बस्ती में,
किसी का रेत में भी सफर कटता है।
हो इनायत जहनी खुदादाद अब शाहरूख पे,
इंकलाबी लहजों से जालिम का पर कटता है।
वेवहर लड़खड़ाती, है अब ग़ज़ल मेरी,
इसी पेशोपेश में जैरो- जबर कटता है।
शाहरुख मोईन
अररिया बिहार

No comments:
Post a Comment