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दिल कठोर कीजिए

  दिल कठोर कीजिए


मैय्या  मेरी कुछ तो जरुर कीजिए।
दिल को वज्र से कठोर   कीजिए।।

जाते उलझ सब भोलेपन के  नाते।
इन  मनचलों का कोई तोड़ कीजिए।।

दिल तोड़ना - जोड़ना लोगों का पेशा यहाँ।
पेशेवरों  के  गर्दन   को  मरोड़   दीजिए।।

मरना   शीरत  पर  हो    सूरत  पे  नहीं ।
फेविकिक जैसा दिल का जोड़ कीजिए।।

एक ही दिल पे   लालायित  हैं   हजारों।
कुछ   इनके  दिलों   में   अजोर कीजिए।।

पहले दफा  टूटा दिल  तो  अटैक आ गया।
गठजोड़   में    हमें   तो   पोढ़   कीजिए।।

हर पल  जीवन - जवानी  खिसक ही रही।
आप  किसी  के  दिल   का न खोंड़ कीजिए।।

दिल  सहके घन हथौड़ा मजबूत हो गया।
मेरे अखंड   दिल में  ना फोड़  कीजिए।।

मूरख  कितने  अभी  इस जहाँ में  पड़े।
उन्हें  गधे  से  खच्चर - घोंड़   कीजिए।।

दिल  लगा हो ना लगा हो फर्क है नहीं।
केवल  दिल   लगाने  का शोर  कीजिए।।

हर  चौराहे  पर   यहाँ   दुश्शासन खड़े।
इनके दिलों को मोम सा कमजोर कीजिए।।

नजर पड़ते  ही भग्न  हो  दिल  इनका।
स्वयं इनको मिटने को  मजबूर कीजिए।।

कमियों  का  अंबार   - अबला  में  भरा।
इनको     मृगतृष्णा   से   दूर   कीजिए।।

द्रोपदी  ने   सारी   पहनना   छोड़  दी।
अन्याय  दुश्शासन पे ना  घोर  कीजिए।।

स्वरचित मौलिक             । ।कविरंग ।।
                   पर्रोई - सिद्धार्थ नगर (उ0प्र0)

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