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बेरोजगार berojgar

बेरोजगार 


शहर में अंकिचन का जीवन 
त्रासदी को समर्पित है 
जगह जगह का हर अख़बार 
मौत की घटनाओं से लिप्त है 

मैं चलता हूँ मैं झाँकता हूँ 
रोजगार के चक्कर में 
गरीबों के अमुल्य जीवन को 
नष्ट होते हुए देखता हूँ

एक खेतिहर मजदूर 
अपने घर का खर्च चलाता है
कर्ज के भारी चक्कर में 
फाँसी का फंदा लगाता है 

सरकारी बाग का रखवाला
रात-दिन चौकन्ना रहता है 
नेताओं की विवशता के आगे 
मौत के मुँह में चला जाता है 

माँ बाप का लाडला 
बड़ा होकर कुछ बनना चाहता है 
बेरोजगारी के चक्कर में
रेल से कट जाता है 

दिल्ली के ताज पर बैठे 
नेता वाहवाही लुटते हैं 
अरे कुछ तो इनकी तरफ देखों 
हर दिन ये जिंदगी से छुटते हैं 

रोजगार के चक्कर में हम 
बेरोजगार हो गये हैं 
धन का अपव्यय करने वाले 
ये नेता चमकदार हो गये हैं 

सारांश

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