सासु संताप बहू प्रताप
।। 1।।
नारी अनारी बेचारी नहीं, अधिकारी बनी वह आवति हैं
बगल में बैग टाँगे रहैं, निज अधिकार जनावति हैं।
जुबान पे लागे लगाम नहीं, बहु घर में उधुम मचावति हैं
सास-ससुर के जबान अपार, बोले पे जेल पठावति हैं।।
।। 2।।
अरमान सबै धूरि भये, जब से घर में वह पैर रखी है
बात केहू के सुनै नहीं, मानों अन्याय की पूरी सखी है।
पतोहू बदे उपवास करैं, रोवत सब सासु मजा चखी हैं
बाल कै खाल निकालतिहै मारग ईर्ष्या को आज लखी है।
।। 3।।
गणेश महेश मनाये से, पाये तबै हम सुन्दर लाला
पतोहू धनी दिनरात तनी, नाम हनी कछू न दिखाला।
जबसे आयी केवल रोवाई, आज बनी हिये की भाला
सुकुमारि बड़ी उतारे रहे, यमफाँस वनी वह सुंदर बाला।।
।। 4।।
बेटवा सोझ बहू भै बोझ, विधना जोड़ी कैसी रची है
रीन्हल भात घरे में सरै, गृह भीतर युद्ध सदा मची है।
पास-पडो़स सब जानि गये, इज्जत नैक न थोड़ी बची है
सूरत वाहि के काव कहूँ, देखे में मानो निरफुल सची है।।
।। 5।।
सासु को आँसु पटात नहीं, पतोहू के मार से देह पिराला
जानी - पहचानी मै लाय रही, आज बनी कितना कराला।
गाँव के केहू के आवत देखै, चाल चले ओ जइसे मराला
होंठ के लाली झुरात नहीं, कर्ण में सोहत सुन्दर झाला।।
स्वरचित मौलिक । ।कविरंग ।।
पर्रोई - सिद्धार्थ नगर( उ0प्र0)


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