प्रीतम अव्यक्त
अन्तः मृदु बाहर से सक्त।
कहां छिपे प्रीतम अव्यक्त।।
नील गगन के उसपार
जैसे कोई रहा पुकार
मानने वाला मै नहीं हार
छिपे कहां हो सुकुमार
बन्धन जग के आओ फार
हे धड़कते हृदय के रक्त।। कहां छिपे - - - -
जब से तेरा हुआ विछोह
दर-दर भटका घेरे मोह
दूर दिलों से होता द्रोह
तूं ही भूषन तूं ही सोह
लगा रहा पाने की टोह
बनके फिरा मैं तेरा भक्त।। कहां छिपे - - - - -
पत्ता - पत्ता कलियाँ - कलियाँ
खोजा तुमको गलियाँ - गलियाँ
तोड़ के देखा फलियां-फलियां
रहा ढूढ़ता नलियां- नलियां
जाता वलि मै वलियां-वलियां
कैसे झूमें मस्ती में दरख्त।। कहां छिपे - - - - -
कैसे होगा तेरा मिलना
हँसी ठिठोली डर में हिलना
स्वतः हृदय का अंतः खिलना
टूटे दिलों को फिर से सिलना
शेष दिनों को रह-रह गिनना
निशि-वासर मैं जीता नक्त।। कहां छिपे - - - -
तिल-तिल मैं अब टूट रहा हूँ
पाने से तुझको चूक रहा हूँ
पूर्ण नहीं अब टूक रहा हूँ
ईर्ष्या तृष्णा फूँक रहा हूँ
मदन मार से मूक रहा हूँ
तुम पर ही है मुझको फक्त।। कहां छिपे - - - - -
स्वरचित मौलिक
।। कविरंग ।।
पर्रोई - सिद्धार्थ नगर( उ0प्र0)

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