जग तेरा विस्तार
ये जगत तेरा ही विस्तार।
हमें बुलाता बाँहें पसार।।
है फूलों में तेरा मुस्कान
नद झरनों में तेरा गान
मै मूरख समझ न पाया
बना रहा मै अन्जान
प्रभु तेरे कितने आकार।। हमें बुलाता - - - -
कहीं बने भूधर विशाल
दिखे कहीं सागर विकराल
कण-कण में रूप समाया
हो श्वेत शुभ्र हिम कराल
फैले जग में कितने प्रकार।। हमें बुलाता - - - - -
खग कलरव में छिपे हो तुम
शून्य अनन्त में हुए हो गुम
ढलते सूरज के रंगों में
मिले हो जैसे हल्दी कुमकुम
दिखता पग-पग रूप साकार।। हमें बुलाता - - - -
रँभती गायों के आवाजों में
छिंड़े हुए गायन साजो में
हरियाली बन भू पर फैले
प्रकृति के गुह्यतम राजों में
लगता सबकुछ हमें असार।। हमें बुलाता - - - -
मन्द पवन में बहते धीरे-धीरे
चल रहे नदी संग तीरे - तीरे
हो अबोध बालक के मंद हास
बने लघूर्मि नद नीरे - नीरे
तुमसे ही चमका संसार।। हमें बुलाता - - -
जा बसे प्रेयसी काजल में
माँ की ममता बन बैठे आँचल में
तेरे सुषमा का क्या कहना
नर्गिस के फूल बने अरुणांचल में
तुम हो प्रेमी हृदय के चीत्कार।। हमें बुलाता - - - -
तुम्ही कौमुदी के विमल हास
रवि उड्गन को देते प्रकाश
सर्व खल्विदं ब्रह्म बने तुम्ही
यह ब्रह्माण्ड तेरा ही विकास
ईश्वर तेरी महिमा अपार।। हमें बुलाता - - - - -
स्वरचित मौलिक ।। कविरंग ।।
पर्रोई - सिद्धार्थ नगर( उ0प्र0)

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