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गीतों की हाला हो तुम

गीतों की हाला हो तुम

गीतों की हाला हो तुम
सुरभित ,मधुशाला हो तुम
कितने ही देख नशे में है
ऐसा मधु का प्याला हो तुम

आंखों में लगा गहरा काजल
नैनों पर नजर का वाण चढ़ा
कितने ही शिकार किये तुमने
अधरों को सुर्ख जब लाल किया

सपनों की परी दिल की रानी
है मानते प्रेम के सब ज्ञानी
तुम बस जाती जिसके मन में
होती तब उसको हैरानी

हवा का झोंका जब आता
हो जाती लटें तब तूफानी
अम्बर भी न खुद को रोक सका
बरसाता फिर जी भर के पानी

चलती  हो नागिन की मटकन
ठहरो तो घटा छा जाती है
सूरज मद्धम हो जाता है
जब तू मुखड़ा दिखलाती है

चखने को सब व्याकुल मय को
अधरों से लगा दे बस पियाला
शाखी न खुद को शाखी समझ
शाखी तू ही है मधुशाला

गीतों की हाला हो तुम
सुरभित, मधुशाला हो तुम
कितने ही देख नशे में है
ऐसा मधु का प्याला हो तुम

सूर्या शर्मा 9716184364

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