।। लोकगीत।।
बरसे न बदरा मोरे अंगनवां।
लागि गइलैं भादों बितलैं सवनवाँ।।
घरी-घरी धूप छाँव हरदम्मै होखै
मशीनी के पानी तुरत खेत सोखै ।
दुआरे के राहि भसुरा ही रोकै
जिव कच्चाय गै देखि के धनवाँ ।। बरसे---
सगरो भेजल पइसा खेती में लगवलीं
फुच्चे सचिन कै नाम हम लिखवलीं।
कवनों सुरह से गयसवो भरवलीं
जरत बाय जियरा तरसे परनवाँ।। बरसे-----
जल्दी न अइबा हमहूं चलि जइबैं
रूखा सूखा मोटा नइहरा में खइबैं।
अइबा घरे तब हम नाहीं देखैबैं
सगरो सहेलिन कै अइलैं सजनवाँ।। बरसे-----
जिनगी में पइसा सब नाहीं हउवे
देखि - देखि हम्मे जरत बाय गउवें।
ससुरे से नीक नइहरा में रहुवे
दिन-रात देखिला रंग के सपनवाँ ।। बरसे----
स्वरचित मौलिक ।। कविरंग ।।
पर्रोई - सिद्धार्थ नगर (उ0प्र0)

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