अबला लाचार क्यों
हे अम्ब! ले नहीं रही अवतार क्यों।
आज हो गयी अबला लाचार क्यों।।
रिश्ता आज कलंकित हो गया है
मानवता न जाने कहाँ खो गया है।
नवरात्रि के ही पूर्व दिवस पर
हद पार दरिन्दगी का हो गया है
देख इतना जुर्म चुप सरकार क्यों।।हे अम्ब - - - -
दरिन्दे दुहिता तन से पट नोचते
निज मां बहन को भी ना सोचते
विदीर्ण करती करुणक्रंदन धरा को
आयी न शर्म भेड़ियों को दृष्टि घूरते
धर्म खो चुका आज विहार क्यों।। हे अम्ब - - - - -
जग वाले झूठे देवि को पूजते
पहले उन भेड़ियों को तो ढूँढ़ते
उनको नग्न खड़ा कर चौराहोंपर
सम्मुख जग के कब्र उनकी खोदते
छाया है दुनिया में कुत्सित विचार क्यों।। हे अम्ब - - - - -
भाई कह - कह बहन पुकार रही
गर्हित मानव मन को लताड़ रही
सद्बुद्धि भी न आयी भेड़ियों को
मानवता को पग से पछाड़ रही
खा गया आज जग सदाचार क्यों।। हे अम्ब - - - -
लेखनी भी लाज से थी कांपती
निकृष्ट मन अंदाज को भांपती
हे माँ! क्या हो गया संसार को
सुता रुदन कर दर्द हृदि मे नापती
फैल - फल रहा जहाँ में अनाचार क्यों।। हे अम्ब - - - - -
हृदि फटा मन हुआ विदीर्ण है
मानवता हो गया जीर्ण शीर्ण है
दृश्य देख दृष्टि में छाया अंधेरा
मानों हृदय में दृश्य उत्कीर्ण है
हिंद मे हो रहा हद अत्याचार क्यों।। हे अम्ब - - - - -
स्वरचित मौलिक ।। कविरंग।।
पर्रोई - सिद्धार्थ नगर (उ0प्र0)

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