देह यष्टि
अरे! मानवी मानव मन की चिरंतन प्यास
लिपट जाने को हर पल तुममें ही आस।
आया चिरकाल से तड़पता ललना में मन
नहिं तृप्त अब तक विलासिनी से तन।।
बरबस हरबार लुटा जाता हूँ दीन
आकृष्ट कर रहे तेरे पयोधर पीन।
हो हेमा रुपसि वामा मनोज्ञा कामिनी
जग को सौंदर्य सुरा पिलाती भामिनी।।
चिरंतन से नर तेरे तन पर खेल रहा
शिशु प्रसव से ही जन-जन का मेल रहा।
अरे! वासुरा मेहना योषिता विलासिनी
प्रकृति वर बन बैठी जन धन अर्धांगिनी।।
अरे! जोषिता तेरा अभिलषित कटि प्रदेश
मानव मन की आकर्षिणी तुम्ही हृदयेश।
तनु सुनंदा नार तीव वासिता बन बैठी
टूट जाते सब कानून तूं जन से कैसे ऐंठी।।
जिन्दा रहने पर जन तुझसे प्यास बुझाते हैं
तुम्हें मृत्यु गोदी में सुलाकर नर न अघाते हैं।
जब तुम्हीं जग की सबसे इच्छित वस्तु
तुम्हें मारकर मानव क्या सुख पाते हैं।।
तुम निश्चित ही अलौकिक दिव्य ज्योति
हृदय में धारण करने को मन की उदोति।
देव मनुज नाग यक्ष गुह्यक गन्धर्व
सुनंदा तेरे तन पर मोहित चराचर सर्व।।
स्वरचित मौलिक ।।कविरंग ।।
पर्रोई - सिद्धार्थ नगर( उ0प्र0)

No comments:
Post a Comment