।। बादल कारे।।
।। गीत।।धौरे श्याम श्वेत रतनारे।
नभ मे घिरे हैं बादल कारे।।
चहुँदिशि चलति हवा अति शीतल
झौर झपति - झंपति पादप दल।
विरहिन मन ना लगति अति चंचल
उच्च गीत गावत मेघा रे।।
घुमड़ि- घुमड़ि बरसत हैं बादल
पिय देखन को तरसत काजल।
सर सोहत मानहुँ गंगाजल
मन पद परसन चहत तिहारे।।
बूँद गिरत शीतल भयि छाती
रसि- रसि धरा तपनि बुझाती।
दादुर धुन मोहे न सोहाती
अब मोहि दर्शन देहु पिया रे।।
हरियर तृण अब जामहि लागे
मिलन भयो पिय जड़ता भागे।
सोवत काम लगहिं अब जागे
तुम्हहिं देखि भय शीत हिया रे।।
अब तौ तिमिर बाजने बाजे
बसुधा निकट खद्योत विराजे।
ताल - तलैया नीर भरि गाजे
मेघ को देन कहौं कहां रे।।
स्वरचित मौलिक
।। कविरंग।।


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