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सुंदर सबेरा

      सुंदर सबेरा

खिलखिलाती धूप निकली
हो  गया     सुन्दर   सबेरा।
लाल   प्राची    हो    गयी
अनिल   ने  सौरभ बिखेरा।। खिलखिलाती - - - - -

बह   रही   शीतल पवन
प्रसूनों   को    गुदगुदाती
तरु डाल पर बैठी विहग
निज  धुन में   चहचहाती
कोयलें भी कूंक  भरकर
गान  सप्तम सुर में   टेरा।। खिलखिलाती - - - - -

कमल भी खिलने   लगे
सर-सरोवर    अंक    में
कठिन  तप को भूलकर
मस्त   हैं   वो    पंक   में
मकरंद लालच हेतु षटपद
पंकजों को   आज   घेरा।। खिलखिलाती - - - -

खड़ी वातायनों पे युवतियां
आनन्द    प्रातः का ले रहीं
नव भजन मुख से   मुखर
ध्यान   प्रभु   पर   दे   रहीं
क्यों   दूर  हमसे  हो मुरारी
करो  हृदि   मे  आ  बसेरा।। खिलखिलाती - - - -

टपका  सुमन पर ओस बूँदें
मानों अश्रु  रजनी ने गिरायी
विछोह   प्रीतम  से  हुआ  है
हुई   आज     वह     परायी
अश्रु   गिरने   से     अधिक
नयनों  में   छापा  है  अँधेरा।। खिलखिलाती - - - - -

आरती  अब  होने    लगी   है
मंदिरों में शंख घड़ियाल गूँजते
चढ़ा   अर्घ्य    शिव   शाम्ब को
नर - नारियां   प्रभु को   पूजते
है    सांवली   सूरत    सलोनी
प्रीति   उर   में    अति   घनेरा।। खिलखिलाती - - - -

दुग्ध   दुहकर    दोग्धा  भी
कनस्तरों   में    हैं    डालते
नहीं   गृह  पर शेष  पय  है                                    साक   पे   जीवन    पालते
गौ  वत्स मुख में थन दबाये
दिख    रहे   शोभन   बछेरा।। खिलखिलाती - - - -

स्वरचित मौलिक      ।। कविरंग ।।
              पर्रोई - सिद्धार्थ नगर( उ0प्र0)

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